ईरान-अमेरिका तनाव

वॉशिंगटन/इस्लामाबाद/तेहरान: पश्चिम एशिया में जारी ईरान-अमेरिका तनाव के बीच एक बार फिर कूटनीतिक हल की उम्मीद जगी है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump ने संकेत दिया है कि ईरान के साथ रुकी हुई वार्ता इस सप्ताह दोबारा शुरू हो सकती है। हालांकि, इसी बीच अमेरिकी सेना द्वारा ईरानी बंदरगाहों पर लागू की गई कड़ी नाकेबंदी ने हालात को और जटिल बना दिया है।

ट्रंप का बड़ा बयान, बातचीत की उम्मीद जगी

न्यूयॉर्क पोस्ट को दिए एक इंटरव्यू में डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि आने वाले दो दिनों में कोई बड़ा घटनाक्रम हो सकता है और इसी वजह से वार्ता फिर से शुरू होने की संभावना है। ट्रंप के इस बयान ने वैश्विक स्तर पर कूटनीतिक हल की उम्मीदों को मजबूत किया है।

सूत्रों के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधिमंडल इस सप्ताह के अंत तक पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में फिर से आमने-सामने आ सकते हैं। हालांकि, अभी तक वार्ता की कोई आधिकारिक तारीख तय नहीं की गई है।

अमेरिकी नाकेबंदी से बढ़ा दबाव

इस बीच, अमेरिकी सेना ने ईरान के बंदरगाहों और तटीय क्षेत्रों पर सख्त नाकेबंदी लागू कर दी है। US Central Command (Centcom) के अनुसार, पहले 24 घंटों में किसी भी जहाज को ईरानी बंदरगाहों में प्रवेश या बाहर निकलने की अनुमति नहीं दी गई।

अमेरिका ने इस कार्रवाई के तहत करीब 12 युद्धपोत और 10,000 सैनिक तैनात किए हैं। इस नाकेबंदी का मकसद ईरान की आर्थिक गतिविधियों, खासकर तेल निर्यात और समुद्री मार्गों से मिलने वाली आय को रोकना है।

Centcom के मुताबिक, छह व्यापारी जहाजों को अमेरिकी निर्देश के बाद वापस लौटना पड़ा। हालांकि, कुछ रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया है कि कुछ जहाज नाकेबंदी के बावजूद Strait of Hormuz को पार करने में सफल रहे।

हॉर्मुज जलडमरूमध्य बना तनाव का केंद्र

ईरान ने 28 फरवरी को अमेरिकी और इजरायली हवाई हमलों के बाद से हॉर्मुज जलडमरूमध्य को प्रभावी रूप से बंद कर रखा है। यह जलमार्ग वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का एक बड़ा केंद्र है, जहां से दुनिया की लगभग एक-तिहाई समुद्री तेल आपूर्ति गुजरती है।

इस मार्ग पर नियंत्रण को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया है। ईरान द्वारा जहाजों से वसूले जाने वाले टोल और तेल निर्यात उसकी अर्थव्यवस्था के प्रमुख स्रोत हैं, जिन्हें निशाना बनाकर अमेरिका दबाव बना रहा है।

संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक प्रतिक्रिया

संयुक्त राष्ट्र महासचिव António Guterres ने कहा है कि वार्ता फिर से शुरू होने की संभावना “काफी अधिक” है। उन्होंने दोनों पक्षों से संयम बरतने और कूटनीतिक रास्ता अपनाने की अपील की।

वहीं, चीन ने अमेरिकी नाकेबंदी को “खतरनाक और गैर-जिम्मेदाराना” करार दिया है। चीन का मानना है कि इस कदम से क्षेत्रीय तनाव और बढ़ेगा और संभावित संघर्षविराम पर भी खतरा मंडरा सकता है।

तेल बाजार पर असर, कीमतों में गिरावट

इस पूरे घटनाक्रम का असर वैश्विक तेल बाजार पर भी पड़ा है। बातचीत की संभावनाओं के चलते मंगलवार को कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गईं। निवेशकों को उम्मीद है कि अगर वार्ता सफल रहती है, तो सप्लाई चेन सामान्य हो सकती है।

हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने चेतावनी दी है कि अगर यह संकट लंबा खिंचता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी की ओर जा सकती है।

इजरायल-लेबनान वार्ता ने खोली नई उम्मीद

इसी बीच, अमेरिका के प्रयासों से इजरायल और लेबनान के बीच भी सीधी बातचीत शुरू हो गई है। यह वार्ता वॉशिंगटन में हुई, जो 1993 के बाद दोनों देशों के बीच पहली आधिकारिक बैठक मानी जा रही है।

दोनों देशों के अधिकारियों ने इस वार्ता को “सकारात्मक” बताया है और इसे क्षेत्र में शांति की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। यह पहल ईरान समर्थित संगठन हिजबुल्लाह के खिलाफ इजरायली कार्रवाई के बाद हुई है।

क्या खत्म होगा गतिरोध?

हालांकि, ईरान-अमेरिका तनाव से हालात अभी भी नाजुक बने हुए हैं। एक तरफ जहां अमेरिका की सख्त सैन्य रणनीति ईरान पर दबाव बना रही है, वहीं दूसरी ओर कूटनीतिक प्रयास भी जारी हैं। ऐसे में आने वाले कुछ दिन बेहद अहम माने जा रहे हैं।

अगर वार्ता सफल होती है, तो यह न केवल क्षेत्रीय तनाव को कम करेगी बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी स्थिरता दे सकती है। लेकिन अगर बातचीत विफल रहती है, तो स्थिति और गंभीर रूप ले सकती है।

By Bhaskar

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