नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट गुजारा भत्ता मामला शुक्रवार को उस समय चर्चा का विषय बन गया, जब झारखंड से जुड़े एक वैवाहिक विवाद में पति ने अदालत के समक्ष यह दलील दी कि उसकी दैनिक आय मात्र ₹325 है, इसलिए वह ₹10,000 प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने में सक्षम नहीं है।
मामले की सुनवाई Supreme Court of India में जस्टिस Vikram Nath और जस्टिस Sandeep Mehta की पीठ कर रही थी। बहस के दौरान अदालत की टिप्पणियों और वकीलों की दलीलों ने पूरे प्रकरण को कानूनी हलकों में सुर्खियों में ला दिया है। फिलहाल अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।
अदालत की टिप्पणी: “तो फिर पत्नी को साथ रखिए”
सुनवाई के दौरान जब पति की ओर से पेश वकील ने कहा कि उसके मुवक्किल की आय केवल ₹325 प्रतिदिन है, तो पीठ ने आश्चर्य जताया। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि पति इतनी कम आय का दावा कर रहा है, तो वह अपनी पत्नी को साथ रखे, जिससे वह परिवार और बच्चों की देखभाल कर सके।
हालांकि पति की ओर से यह कहा गया कि वैवाहिक संबंध सामान्य नहीं हैं और पत्नी ने उसके तथा उसके माता-पिता के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराई हैं। ऐसे में साथ रहना संभव नहीं है।
पीठ ने यह भी कहा कि आवश्यकता पड़ने पर वह उस निजी कंपनी से संपर्क कर सकती है, जहां पति कार्यरत है, ताकि यह स्पष्ट किया जा सके कि उसे इतना कम वेतन क्यों दिया जा रहा है। इस पर पति के वकील ने जवाब दिया कि यदि ऐसा होता है तो यह अन्य कर्मचारियों के लिए भी लाभकारी होगा।
वकील की दलील: वित्तीय क्षमता और दायित्व भी देखें
पति की ओर से पेश अधिवक्ता जॉर्ज पोथन पूथिकोटे ने अदालत में कहा कि माननीय न्यायालय पूर्व में यह स्पष्ट कर चुका है कि गुजारा भत्ता तय करते समय पति की वास्तविक आय, वित्तीय क्षमता, वर्तमान दायित्वों और देनदारियों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
उन्होंने दलील दी कि उनका मुवक्किल बोकारो स्थित एक कार शोरूम में कार्यरत है और प्रतिमाह लगभग ₹9,750 ही कमा पाता है। शेष खर्च वह अपने अभिभावकों और भाइयों की सहायता से पूरा करता है। ऐसे में ₹10,000 प्रतिमाह का गुजारा भत्ता देना उसकी सामर्थ्य से बाहर है।
2002 में शादी, 2016 से अलगाव
मामले के रिकॉर्ड के अनुसार, दंपती की शादी वर्ष 2002 में हुई थी। वर्ष 2003 में बेटे और 2005 में बेटी का जन्म हुआ। वर्ष 2016 से दोनों अलग रह रहे हैं। दोनों बच्चे वर्तमान में पिता के साथ रह रहे हैं।
तलाक की कार्यवाही के दौरान निचली अदालत ने पति को 6 लाख रुपये एकमुश्त गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। वकील के अनुसार, यह राशि पति के पिता ने जमीन बेचकर उपलब्ध कराई थी।
हालांकि बाद में पत्नी ने दावा किया कि यह राशि पर्याप्त नहीं है और उसे 30 लाख रुपये एकमुश्त तथा ₹12,500 प्रतिमाह भरण-पोषण भत्ता दिया जाए।
कानूनी दृष्टि से क्या है मुद्दा?
सुप्रीम कोर्ट गुजारा भत्ता मामला केवल एक पारिवारिक विवाद नहीं, बल्कि भरण-पोषण के निर्धारण के मानकों पर भी सवाल खड़ा करता है। भारतीय कानून के तहत, गुजारा भत्ता तय करते समय पति की आय, जीवन स्तर, पत्नी की जरूरतें, बच्चों की देखभाल और अन्य दायित्वों को संतुलित रूप से देखा जाता है।
अदालतें यह भी सुनिश्चित करती हैं कि भरण-पोषण राशि यथार्थपरक हो और दोनों पक्षों के अधिकारों व कर्तव्यों के अनुरूप हो।
इस मामले में मुख्य प्रश्न यह है कि क्या ₹325 प्रतिदिन की आय का दावा वास्तविक है और यदि हां, तो क्या ऐसी आय के आधार पर उच्च गुजारा भत्ता तय किया जा सकता है?
सामाजिक और आर्थिक परिप्रेक्ष्य
विशेषज्ञों का मानना है कि आज के आर्थिक परिदृश्य में ₹10,000 प्रतिमाह की राशि बहुत बड़ी नहीं मानी जाती, विशेषकर जब परिवार में दो बच्चे हों। वहीं दूसरी ओर, यदि पति की वास्तविक आय सीमित है, तो उस पर अत्यधिक आर्थिक बोझ डालना भी न्यायसंगत नहीं होगा।
इस तरह के मामलों में अदालतें अक्सर संतुलन बनाने का प्रयास करती हैं, ताकि पत्नी और बच्चों का भरण-पोषण सुनिश्चित हो सके और पति पर असंभव दायित्व न डाला जाए।
फैसला सुरक्षित, अगली सुनवाई पर नजर
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। कानूनी हलकों में इस मामले को महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह भविष्य में गुजारा भत्ता तय करने के मानकों को लेकर मार्गदर्शन दे सकता है।
अब सबकी नजर इस बात पर है कि अदालत पति की वित्तीय क्षमता और पत्नी की मांग के बीच किस तरह संतुलन स्थापित करती है।
सुप्रीम कोर्ट गुजारा भत्ता मामला आने वाले दिनों में पारिवारिक कानून से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।

