नई दिल्ली: संसद के उच्च सदन में माता-पिता की देखभाल पासपोर्ट रद्द का मुद्दा प्रमुखता से उठा। भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल ने विदेशों में रह रहे भारतीयों द्वारा अपने माता-पिता की उपेक्षा पर चिंता जताते हुए सख्त कानूनी प्रावधान की मांग की। उन्होंने कहा कि जो प्रवासी भारतीय अपने मां-बाप की देखभाल नहीं करते, उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए, जिसमें पासपोर्ट निरस्त करना भी शामिल हो।
डॉ. अग्रवाल ने सदन में कहा कि पिछले वर्ष ऐसे पांच सौ से अधिक मामले सामने आए, जिनमें भारत में अकेले रह रहे बुजुर्ग माता-पिता का अंत अत्यंत दुखद परिस्थितियों में हुआ, जबकि उनकी संतान विदेश में रह रही थी।
‘त्याग और तपस्या’ का उल्लेख
राज्यसभा में अपनी बात रखते हुए सांसद ने कहा कि देश के करीब साढ़े तीन करोड़ लोग विदेशों में रह रहे हैं। इनमें से अधिकांश के माता-पिता या सास-ससुर भारत में ही रहते हैं। उन्होंने भावनात्मक अंदाज में कहा कि विदेशों में सफलता पाने वाले युवाओं की उपलब्धियों के पीछे उनके माता-पिता का त्याग, तपस्या और संघर्ष निहित है।
उन्होंने कहा कि कई परिवारों में माता-पिता अपने बच्चों को विदेश भेजने के लिए अपनी जमीन-जायदाद तक बेच देते हैं। सस्ती शिक्षा और स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ उठाकर बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं और फिर विदेशों में अवसर तलाशते हैं। ऐसे में उनकी जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल सुनिश्चित करें।
आय का हिस्सा और साप्ताहिक संपर्क अनिवार्य करने का सुझाव
डॉ. अग्रवाल ने सरकार से मांग की कि विदेश जाने वाले भारतीयों से एक हलफनामा लिया जाए, जिसमें वे यह वचन दें कि वे अपनी आय का एक निश्चित हिस्सा माता-पिता की देखभाल के लिए नियमित रूप से भेजेंगे। साथ ही, उन्होंने सुझाव दिया कि बुजुर्गों की देखरेख के लिए केयरटेकर की नियुक्ति और जीवन बीमा की व्यवस्था अनिवार्य की जाए।
उन्होंने यह भी प्रस्ताव रखा कि प्रवासी भारतीय सप्ताह में कम से कम एक बार अपने माता-पिता से टेलीफोन पर बातचीत करें। यदि वे ऐसा नहीं करते और माता-पिता इसकी पुष्टि करते हैं, तो उनके खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान हो।
सांसद का कहना था कि माता-पिता से एक प्रमाणपत्र लिया जाना चाहिए, जिसमें यह पुष्टि हो कि उनकी संतान अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रही है। यदि ऐसा प्रमाणपत्र नहीं दिया जाता, तो संबंधित व्यक्ति का पासपोर्ट निरस्त कर उसे भारत वापस बुलाने का प्रावधान किया जाए।
हालिया घटनाओं का हवाला
अपने वक्तव्य के समर्थन में डॉ. अग्रवाल ने दिल्ली और इंदौर में हाल ही में सामने आई घटनाओं का उल्लेख किया, जहां अकेले रह रहे बुजुर्गों की मृत्यु हो गई, लेकिन उनकी संतान अंतिम समय में भी नहीं पहुंची। उन्होंने कहा कि देशभर में हर साल इस प्रकार के लगभग 500 मामले सामने आते हैं, जिनमें बुजुर्गों की मौत अत्यंत पीड़ादायक परिस्थितियों में होती है।
उन्होंने इस मुद्दे को केवल सामाजिक नहीं, बल्कि नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी का विषय बताया।
मौजूदा कानून को बताया ‘दंतहीन’
डॉ. अग्रवाल ने वर्ष 2007 में लागू Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007 का जिक्र करते हुए कहा कि यह कानून व्यवहारिक रूप से प्रभावी साबित नहीं हो पाया है। इस कानून के तहत माता-पिता को अपने बच्चों से भरण-पोषण की मांग करने के लिए अदालत में जाना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था बुजुर्गों के लिए व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि अदालत की प्रक्रिया समय लेने वाली और मानसिक रूप से थकाऊ होती है। इसलिए कानून में संशोधन कर इसे अधिक सख्त और प्रभावी बनाया जाना चाहिए।
सामाजिक-नैतिक बहस का विषय
माता-पिता की देखभाल पासपोर्ट रद्द करने की मांग ने एक व्यापक सामाजिक और कानूनी बहस को जन्म दिया है। एक ओर जहां इसे बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए सख्त कदम माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर पासपोर्ट निरस्तीकरण जैसे उपायों की संवैधानिक वैधता और व्यावहारिकता पर भी सवाल उठ सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि पासपोर्ट निरस्त करना एक गंभीर प्रशासनिक कार्रवाई है, जो विदेश मंत्रालय और संबंधित एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र में आता है। ऐसे में इस तरह के प्रावधान के लिए स्पष्ट कानूनी संशोधन और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों को ध्यान में रखना आवश्यक होगा।
सरकार की प्रतिक्रिया का इंतजार
फिलहाल सरकार की ओर से इस प्रस्ताव पर औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। हालांकि, बुजुर्गों की सुरक्षा और सामाजिक संरक्षण से जुड़े मुद्दों पर केंद्र और राज्य सरकारें समय-समय पर योजनाएं लागू करती रही हैं।
राज्यसभा में उठे इस मुद्दे ने प्रवासी भारतीयों की जिम्मेदारी, पारिवारिक मूल्यों और कानूनी दायित्वों को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या सरकार इस दिशा में कोई ठोस नीति बनाती है या मौजूदा कानून में संशोधन पर विचार करती है।
माता-पिता की देखभाल पासपोर्ट रद्द करने की मांग केवल एक राजनीतिक वक्तव्य नहीं, बल्कि तेजी से बदलते सामाजिक ढांचे में बुजुर्गों की सुरक्षा को लेकर गहराती चिंता का संकेत भी है।

