देहरादून, 27 मार्च 2026: उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदा के बढ़ते खतरे को देखते हुए देहरादून जिला प्रशासन ने व्यापक और दूरदर्शी कदम उठाए हैं। जिलाधिकारी सविन बंसल की अध्यक्षता में आयोजित जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की बैठक में जन सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए कई अहम प्रस्तावों को मंजूरी दी गई। इस निर्णय के तहत जिले के 28 संवेदनशील नदी तटों पर चैनलाइजेशन और सुरक्षात्मक कार्यों को सशर्त स्वीकृति दी गई है, जिससे मानसून के दौरान संभावित खतरे को कम किया जा सके।
जन सुरक्षा सर्वोपरि, समयबद्ध तरीके से पूरे होंगे कार्य
बैठक में जिलाधिकारी सविन बंसल ने स्पष्ट किया कि प्राकृतिक आपदा न्यूनीकरण से जुड़े कार्य केवल निर्माण नहीं बल्कि जनहित से जुड़े सुधारात्मक उपाय हैं। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि सभी स्वीकृत कार्यों को तय समय सीमा के भीतर पूरा किया जाए, ताकि किसी भी संभावित आपदा से पहले ही प्रभावी तैयारी सुनिश्चित हो सके।
उन्होंने यह भी कहा कि विभागों को अपने स्तर पर और अधिक सुझाव देने चाहिए, जिससे भविष्य में आपदा प्रबंधन को और अधिक मजबूत बनाया जा सके। साथ ही, समिति की बैठकें अब नियमित अंतराल पर आयोजित करने का निर्णय भी लिया गया है।
नदी चैनलाइजेशन और ड्रेजिंग कार्यों को मिली प्राथमिकता
इस बैठक का सबसे अहम निर्णय नदियों के चैनलाइजेशन और ड्रेजिंग कार्यों को लेकर रहा। तहसील स्तर और विभिन्न विभागों से प्राप्त प्रस्तावों को समिति ने मंजूरी दे दी है। इन कार्यों का उद्देश्य नदी के प्रवाह को नियंत्रित करना और जलभराव तथा बाढ़ के खतरे को कम करना है।
विशेष रूप से हरिपुर कालसी क्षेत्र में यमुना नदी तट पर श्रद्धालुओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए घाट निर्माण के लिए चैनलाइजेशन कार्य को स्वीकृति दी गई है। इसके अलावा सहिया क्षेत्र के कालसी-चकराता मोटर मार्ग पर जजरेड में स्थित क्रॉनिक लैंडस्लाइड जोन में भूस्खलन न्यूनीकरण कार्य भी प्राथमिकता में शामिल किए गए हैं।
भूस्खलन और बाढ़ से निपटने के लिए बहु-स्तरीय रणनीति
जिले के विभिन्न हिस्सों में भूस्खलन और बाढ़ के जोखिम को देखते हुए प्रशासन ने बहु-स्तरीय रणनीति अपनाई है। राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-507 पर किमी 13-14 के बीच यमुना नदी के पास स्थित पुल पर एबटमेंट स्कप्पर निर्माण, नदी प्रवाह को व्यवस्थित करने के लिए चैनलाइजेशन, दोनों तटों पर कर्टेन वॉल निर्माण और अन्य सुरक्षात्मक कार्य प्रस्तावित किए गए हैं।
इसके अलावा किमी 24 बोसाना और किमी 26 व्यासी क्षेत्रों में भूस्खलन उपचार कार्य भी किए जाएंगे। भानियावाला-ऋषिकेश मार्ग पर चंद्रभागा नदी के किनारे रिवर ड्रेसिंग और जाखन ब्रिज के अपस्ट्रीम में जमा मलबे को हटाने जैसे कार्य भी इस योजना में शामिल हैं।
संयुक्त समिति करेगी निरीक्षण, रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई
इन सभी कार्यों की गुणवत्ता और प्रभावशीलता सुनिश्चित करने के लिए प्रशासन ने एक संयुक्त समिति का गठन किया है। इस समिति में उपजिलाधिकारी, प्रभागीय वनाधिकारी, अधिशासी अभियंता और अन्य संबंधित विभागों के अधिकारी शामिल हैं।
समिति को निर्देश दिए गए हैं कि वे संबंधित स्थलों का स्थलीय निरीक्षण करें और विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करें। इसी रिपोर्ट के आधार पर आगे की स्वीकृति और कार्यान्वयन प्रक्रिया को गति दी जाएगी।
पूर्व आपदाग्रस्त क्षेत्रों पर विशेष ध्यान
अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) केके मिश्रा ने बताया कि जिन क्षेत्रों में पहले प्राकृतिक आपदा की घटनाएं हो चुकी हैं या जहां भविष्य में खतरे की आशंका है, वहां विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि मार्च माह में ही इन कार्यों को मंजूरी देने का उद्देश्य यह है कि विभागों को मानसून से पहले पर्याप्त समय मिल सके और कार्यों को प्रभावी ढंग से पूरा किया जा सके। साथ ही, जिन विभागों के प्रस्ताव अभी लंबित हैं, उन्हें जल्द से जल्द प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं।
प्रशासन की सक्रियता से बढ़ेगी आपदा से निपटने की क्षमता
देहरादून जिला प्रशासन द्वारा उठाए गए ये कदम राज्य में आपदा प्रबंधन को एक नई दिशा देने वाले साबित हो सकते हैं। समय रहते संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, योजनाबद्ध तरीके से कार्यों की स्वीकृति और नियमित निगरानी से न केवल जन-धन की हानि को कम किया जा सकेगा, बल्कि भविष्य में आपदाओं से निपटने की क्षमता भी मजबूत होगी।
बैठक में जिला पंचायत अध्यक्ष सुखविंदर सिंह कौर, प्रभागीय वनाधिकारी नीरज कुमार, लोक निर्माण विभाग के अधीक्षण अभियंता ओपी सिंह, राष्ट्रीय राजमार्ग के अधिशासी अभियंता सुरेश तोमर, क्षेत्राधिकारी विवेक कोटियाल और जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी ऋषभ कुमार सहित कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। वहीं, अन्य विभागों के अधिकारी वर्चुअल माध्यम से बैठक में शामिल हुए।
देहरादून में प्राकृतिक आपदा न्यूनीकरण कार्यों को लेकर लिया गया यह निर्णय न केवल प्रशासन की सक्रियता को दर्शाता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि आने वाले समय में प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को कम करने के लिए ठोस और समयबद्ध कदम उठाए जा रहे हैं। यदि इन योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन होता है, तो यह मॉडल अन्य जिलों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है।
