ईरान अमेरिका टकराव

ईरान में सरकार के ख़िलाफ़ जारी विरोध-प्रदर्शनों ने एक बार फिर पश्चिम एशिया को वैश्विक राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है। इन प्रदर्शनों के बीच अमेरिका की संभावित सैन्य कार्रवाई को लेकर अटकलें तेज़ हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई मौकों पर सार्वजनिक रूप से यह संकेत दे चुके हैं कि ईरान में सत्ता परिवर्तन अमेरिका के रणनीतिक हितों के अनुरूप हो सकता है। यह बयान केवल वर्तमान राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे दशकों पुराना इतिहास और गहरी भू-राजनीतिक सोच छिपी है।

1953 का तख्तापलट: आधुनिक ईरान की दिशा बदलने वाला मोड़

ईरान में किसी विदेशी शक्ति द्वारा शांतिकाल में सत्ता परिवर्तन की पहली बड़ी मिसाल 1953 में देखने को मिली। उस समय ईरान के लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग को अमेरिका और ब्रिटेन की खुफिया एजेंसियों ने मिलकर अपदस्थ कर दिया। मोसादेग ने ईरान के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया था, जिससे पश्चिमी कंपनियों के हितों को सीधी चुनौती मिली।

मोसादेग का उद्देश्य केवल आर्थिक संप्रभुता तक सीमित नहीं था। वह शाह की शक्तियों को सीमित कर ईरान को एक वास्तविक लोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर ले जाना चाहते थे। लेकिन यही सोच पश्चिमी शक्तियों के लिए असहज साबित हुई। परिणामस्वरूप शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी को दोबारा पूर्ण सत्ता सौंप दी गई।

अमेरिका समर्थक शासन और बढ़ता असंतोष

1953 के बाद ईरान में शाह पहलवी का शासन अमेरिका समर्थक और पश्चिमी हितों के अनुरूप रहा। ईरान का तीव्र पश्चिमीकरण, सैन्य आधुनिकीकरण और अमेरिका पर बढ़ती निर्भरता एक वर्ग के लिए विकास का प्रतीक थी, लेकिन बड़े सामाजिक और धार्मिक तबके में इससे असंतोष पनपने लगा।

यही असंतोष आगे चलकर एक ऐसे आंदोलन में बदल गया जिसने न केवल शाह को सत्ता से बाहर किया, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की राजनीति की धुरी बदल दी।

1979 की इस्लामिक क्रांति: अमेरिकी नीति की प्रतिक्रिया

1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई, जिसने शाह पहलवी के शासन का अंत कर दिया। इस क्रांति के नेता रूहोल्लाह ख़ुमैनी थे, जो इससे पहले तुर्की, इराक़ और फ्रांस के पेरिस में निर्वासन का जीवन जी रहे थे।

ख़ुमैनी ने शाह पर ईरान के पश्चिमीकरण और अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता का आरोप लगाया। उनके नेतृत्व में बनी नई इस्लामिक व्यवस्था ने अमेरिका-विरोध को अपनी वैचारिक नींव का हिस्सा बना लिया। यही कारण है कि 1979 के बाद से ईरान और पश्चिम, विशेषकर अमेरिका, के रिश्तों में लगातार कड़वाहट बनी रही।

वर्तमान परिदृश्य: ख़ामेनेई और सत्ता परिवर्तन की चर्चा

आज ईरान में सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई के नेतृत्व में इस्लामिक गणराज्य कायम है। हालिया विरोध-प्रदर्शन आर्थिक संकट, सामाजिक प्रतिबंधों और राजनीतिक असंतोष की अभिव्यक्ति हैं। इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका द्वारा ईरान में सत्ता परिवर्तन की बातें फिर से उभर रही हैं।

अमेरिकी रणनीति केवल आंतरिक असंतोष तक सीमित नहीं है। ईरान का परमाणु कार्यक्रम, पश्चिम एशिया में उसका प्रभाव और इज़राइल के साथ तनाव इस टकराव को और जटिल बनाते हैं।

रूस और चीन: समर्थन या संतुलन?

यदि अमेरिका ईरान पर सैन्य कार्रवाई करता है, तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि उसके खिलाफ कौन खड़ा होगा। रूस और चीन ईरान के प्रमुख साझेदार माने जाते हैं और दोनों देशों ने अमेरिकी दबाव का सार्वजनिक रूप से विरोध भी किया है।

हालांकि, यह विरोध अब तक अधिकतर कूटनीतिक बयानों तक सीमित रहा है। पिछले वर्ष जून में जब अमेरिका ने इज़राइल के समर्थन में ईरान के परमाणु ठिकानों पर कार्रवाई की थी, तब भी रूस और चीन ने केवल ज़ुबानी विरोध दर्ज कराया था।

रूस–ईरान संबंध और उसकी सीमाएं

यूक्रेन युद्ध के बाद से रूस और ईरान के रिश्ते और गहरे हुए हैं। ईरान ने रूस को ड्रोन और गोला-बारूद की आपूर्ति की, जबकि रूस ने बदले में आर्थिक और सैन्य सहयोग बढ़ाया। इससे दोनों देशों के बीच पारस्परिक निर्भरता ज़रूर बढ़ी है।

इसके बावजूद, ईरान ऐसा सहयोगी नहीं है जिसके लिए रूस अमेरिका के साथ सीधे सैन्य टकराव का जोखिम उठाए। जून की घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि मॉस्को अपने रणनीतिक हितों को प्राथमिकता देता है, न कि वैचारिक साझेदारी को।

आगे क्या?

ईरान–अमेरिका टकराव केवल दो देशों का संघर्ष नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन, ऊर्जा राजनीति और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़ा मसला है। 1953 का तख्तापलट, 1979 की इस्लामिक क्रांति और मौजूदा विरोध-प्रदर्शन—ये सभी घटनाएं एक ही श्रृंखला की कड़ियां हैं।

अगर अमेरिका ईरान में सीधे हस्तक्षेप करता है, तो इसके परिणाम केवल तेहरान तक सीमित नहीं रहेंगे। यह पूरा पश्चिम एशिया, रूस–चीन–अमेरिका समीकरण और वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। यही वजह है कि ईरान संकट आज भी दुनिया की सबसे संवेदनशील भू-राजनीतिक चुनौतियों में से एक बना हुआ है।

By Bhaskar

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *