I-PAC ED रेड मामला
कोलकाता में 8 जनवरी को I-PAC (Indian Political Action Committee) के कार्यालय और इसके डायरेक्टर प्रतीक जैन के आवास पर हुई प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी अब एक बड़े संवैधानिक और राजनीतिक विवाद का रूप ले चुकी है। इस मामले में प्रवर्तन निदेशालय की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई, जहां अदालत ने ED द्वारा लगाए गए आरोपों को “बेहद गंभीर” करार दिया।
सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच—जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस विपुल पंचोली—ने स्पष्ट किया कि इस मामले में नोटिस जारी किया जाएगा और तथ्यों की गहराई से जांच की जाएगी। कोर्ट ने खास तौर पर उस स्थिति पर चिंता जताई, जिसमें कोलकाता हाईकोर्ट में ED की याचिका की सुनवाई के दौरान अव्यवस्था और कथित दबाव का माहौल देखने को मिला।
ED के आरोप: जांच में बाधा और ‘संगठित अव्यवस्था’
ED की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने सुप्रीम कोर्ट के सामने कहा कि 14 जनवरी को कोलकाता हाईकोर्ट में हुई सुनवाई से एजेंसी संतुष्ट नहीं है।
ED के मुताबिक, सुनवाई के दौरान बार-बार माइक बंद होना, कोर्ट परिसर में भीड़ जुटना और सामान्य प्रक्रिया में बाधाएं पैदा होना असाधारण स्थिति थी। एजेंसी ने आरोप लगाया कि कोर्ट में भीड़ इकट्ठा करने के लिए बसों और गाड़ियों की व्यवस्था की गई थी, जिसके बाद हालात इतने बिगड़े कि एक्टिंग चीफ जस्टिस को आदेश देना पड़ा कि वकीलों के अलावा किसी को भी कोर्ट रूम में प्रवेश न दिया जाए।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि “भीड़ ऐसे बुलाई गई, मानो जंतर-मंतर हो।” अदालत की यह टिप्पणी इस मामले की गंभीरता और संवेदनशीलता को रेखांकित करती है।
सुप्रीम कोर्ट में तीखा सवाल-जवाब
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट और ED के वकीलों के बीच कई अहम सवाल-जवाब हुए। अदालत ने पूछा—
“आप वहां (I-PAC ऑफिस) किसलिए गए थे? किस बात की जांच चल रही थी?”
इस पर सॉलिसिटर जनरल ने जवाब दिया कि राज्य सरकार यह प्रचार कर रही है कि ED SIR डेटा जब्त करने गई थी, जबकि SIR डेटा पहले से सार्वजनिक वेबसाइट पर उपलब्ध है। उन्होंने कहा,
“कोई मूर्ख ही होगा जो सार्वजनिक डेटा जब्त करने जाएगा। ED अवैध कोयला घोटाले की जांच के सिलसिले में वहां गई थी।”
जब सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि क्या कोयला घोटाले की जांच अभी भी जारी है, तो ED ने स्पष्ट रूप से ‘हां’ में जवाब दिया।
ED का दावा: कैश ट्रांजैक्शन और हवाला चैनल
ED ने कोर्ट को बताया कि कथित कोयला घोटाले में कोयले का भुगतान नकद में किया जाता था। कई समन जारी किए गए, लेकिन उनका कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। जांच के दौरान एक हवाला चैनल की पहचान की गई, जिसके ज़रिये लगभग 20 करोड़ रुपये नकद I-PAC को ट्रांसफर किए गए।
इसी आधार पर 8 जनवरी को I-PAC से जुड़े कुल 10 ठिकानों पर तलाशी ली गई। ED का कहना है कि इस कार्रवाई से पहले संबंधित अधिकारियों को ईमेल के ज़रिये जानकारी भी दी गई थी और एजेंसी की किसी भी तरह की राजनीतिक गतिविधियों में कोई दिलचस्पी नहीं थी।
I-PAC और प्रशांत किशोर का संदर्भ
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी पूछा कि क्या यह वही I-PAC है, जिससे पहले प्रशांत किशोर जुड़े रहे हैं। ED ने इसकी पुष्टि की।
इस बिंदु पर अदालत ने यह भी जानना चाहा कि आखिर ऐसा क्या था, जिसे छिपाने के लिए मुख्यमंत्री खुद पूरी पुलिस फोर्स के साथ मौके पर पहुंचीं। ED के इस बयान ने राजनीतिक हलकों में हलचल और तेज कर दी।
कपिल सिब्बल की दलील: चुनावी समय पर कार्रवाई क्यों?
पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने ED की कार्रवाई के समय पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कोयला घोटाले में आखिरी बयान फरवरी 2024 में दर्ज किया गया था।
सिब्बल ने पूछा—“तब से ED क्या कर रही थी? चुनावों के समय अचानक यह कार्रवाई क्यों?”
उन्होंने दलील दी कि पश्चिम बंगाल में चुनावी रणनीति की जिम्मेदारी I-PAC के पास है और पार्टी ने 2021 में I-PAC के साथ कॉन्ट्रैक्ट किया था। I-PAC के पास पार्टी से जुड़ा संवेदनशील डेटा मौजूद है, जिसे ED अच्छी तरह जानती थी।
सुप्रीम कोर्ट की व्यंग्यात्मक टिप्पणी
जब कपिल सिब्बल ने कहा कि ED को पता था कि वहां पार्टी से जुड़ा डेटा मौजूद होगा, तो सुप्रीम कोर्ट ने हल्के-फुल्के लेकिन तीखे अंदाज़ में टिप्पणी की—
“अगर चुनाव के दौरान मनी लॉन्ड्रिंग होती है, तो इसमें ED की क्या गलती है?”
इस टिप्पणी को कई कानूनी विशेषज्ञ ED की कार्रवाई के पक्ष में एक मजबूत संकेत के तौर पर देख रहे हैं।
राजनीति, जांच और संस्थागत टकराव
I-PAC ED रेड मामला अब केवल एक छापेमारी तक सीमित नहीं रह गया है। यह मामला केंद्र और राज्य सरकार के बीच टकराव, जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता और न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता जैसे बड़े सवालों को जन्म देता है।
सुप्रीम कोर्ट का यह रुख कि वह नोटिस जारी कर तथ्यों की जांच करेगा, यह संकेत देता है कि अदालत इस पूरे घटनाक्रम को गंभीरता से ले रही है। आने वाले दिनों में यह केस न केवल पश्चिम बंगाल की राजनीति, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर एजेंसियों और राज्यों के संबंधों की दिशा भी तय कर सकता है।
आगे की राह
अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं। यह देखना अहम होगा कि कोर्ट ED के आरोपों को किस हद तक स्वीकार करता है और पश्चिम बंगाल सरकार की भूमिका पर क्या निष्कर्ष निकालता है।
एक बात तय है—I-PAC ED रेड मामला आने वाले समय में केवल कानूनी नहीं, बल्कि राजनीतिक और संवैधानिक बहस का बड़ा मुद्दा बनने जा रहा है।

