उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के प्रभात ध्यानी हिरासत केस को लेकर नैनीताल हाईकोर्ट सख्त हुआ। ऋषिकेश रेलवे स्टेशन से कथित रूप से जबरन हिरासत में लिए जाने के मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से कई अहम सवाल पूछते हुए विस्तृत जवाब तलब किया है। अदालत ने प्रथम दृष्टया नागरिकों की स्वतंत्र आवाजाही और पुलिस कार्रवाई के कानूनी आधार को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है।
प्रभात ध्यानी हिरासत केस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति रविंद्र मैठानी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ शाह की खंडपीठ के समक्ष हुई। सुनवाई के बाद अदालत ने राज्य सरकार सहित सभी संबंधित पक्षों को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। साथ ही मामले की अगली सुनवाई के लिए 16 सितंबर की तारीख तय की गई है।
यह मामला केवल एक व्यक्ति की हिरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी और नागरिकों के आवागमन के अधिकार से जुड़े महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न भी खड़े करता है।
क्या था पूरा मामला?
याचिका के अनुसार, 19 जुलाई की शाम उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष प्रभात ध्यानी ऋषिकेश रेलवे स्टेशन से दिल्ली जाने वाली ट्रेन में सवार हुए थे। बताया गया कि वह सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के समर्थन तथा छात्रों से जुड़े आंदोलन में भाग लेने के उद्देश्य से दिल्ली जा रहे थे।
इसी दौरान उत्तराखंड पुलिस कथित रूप से रेलवे स्टेशन पहुंची और उन्हें ट्रेन के डिब्बे से उतारकर हिरासत में ले लिया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि उन्हें बिना किसी स्पष्ट कानूनी आधार के अज्ञात स्थान पर ले जाया गया तथा काफी समय तक उनके परिजनों और सहयोगियों को उनकी स्थिति की जानकारी नहीं दी गई।
याचिकाकर्ता का कहना है कि इस पूरी कार्रवाई के दौरान उनका मोबाइल फोन भी जब्त कर लिया गया, जिससे परिवार का उनसे संपर्क पूरी तरह टूट गया।
अदालत ने सरकार से पूछे तीखे सवाल
प्रभात ध्यानी हिरासत केस सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि प्रभात ध्यानी के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 172 के तहत कार्रवाई की गई है। सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि वह दिल्ली में छात्रों और सीजेपी के प्रस्तावित प्रदर्शन में शामिल होने जा रहे थे।
सरकार ने अदालत को यह भी जानकारी दी कि दिल्ली पुलिस ने विभिन्न राज्यों को एक नोटिस जारी किया था, जिसमें ऐसे लोगों को अपने-अपने राज्यों की सीमा पर रोकने का अनुरोध किया गया था जो उक्त प्रदर्शन में शामिल होने के लिए दिल्ली पहुंच रहे थे।
हालांकि, सरकार के इस पक्ष पर हाईकोर्ट ने कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए।
खंडपीठ ने पूछा—
- आखिर किस कानूनी प्रावधान के तहत किसी व्यक्ति को चलती ट्रेन से उतारकर हिरासत में लिया गया?
- पुलिस को किस आधार पर यह जानकारी थी कि संबंधित व्यक्ति प्रदर्शन में भाग लेने जा रहा है?
- यदि कोई नागरिक किसी आंदोलन में भाग लेने जा रहा है, तो क्या केवल इस आधार पर उसकी स्वतंत्र आवाजाही पर रोक लगाई जा सकती है?
- क्या इस प्रकार की कार्रवाई संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं मानी जाएगी?
अदालत की इन टिप्पणियों ने मामले को केवल पुलिस कार्रवाई तक सीमित न रखकर व्यापक संवैधानिक विमर्श का विषय बना दिया है।
याचिका में क्या लगाए गए आरोप?
यह याचिका उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के केंद्रीय सचिव लाल मणि की ओर से हाईकोर्ट में दायर की गई है।
प्रभात ध्यानी हिरासत केस याचिका में कहा गया है कि प्रभात ध्यानी ने सोशल मीडिया पर पहले ही जानकारी साझा की थी कि पार्टी के कार्यकर्ता छात्रों की शिक्षा से जुड़े मुद्दों और सोनम वांगचुक के समर्थन में दिल्ली जाने वाले हैं।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि इसी सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर पुलिस ने उन्हें निशाना बनाया और रेलवे स्टेशन से हिरासत में ले लिया।
याचिका में यह भी कहा गया है कि प्रभात ध्यानी का काफी समय तक कोई पता नहीं चल सका। परिवार को यह जानकारी नहीं थी कि उन्हें कहां ले जाया गया है और उनकी स्वास्थ्य स्थिति कैसी है। इससे परिजनों को मानसिक तनाव और अनिश्चितता का सामना करना पड़ा।
‘मौलिक अधिकारों का उल्लंघन’
याचिका में पुलिस कार्रवाई को संविधान के तहत प्राप्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आवागमन की स्वतंत्रता का उल्लंघन बताया गया है।
प्रभात ध्यानी हिरासत केस में याचिकाकर्ता का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं है और वह केवल किसी लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन में भाग लेने के लिए यात्रा कर रहा है, तो उसे इस प्रकार हिरासत में लेना कानून की भावना के विपरीत है।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि प्रभात ध्यानी स्वास्थ्य परीक्षण के लिए भी जाने वाले थे। ऐसे में बिना पर्याप्त कारण बताए उन्हें ट्रेन से उतारना और हिरासत में लेना न केवल अनुचित बल्कि कानूनी प्रक्रिया के भी विरुद्ध है।
साथ ही अदालत से मांग की गई है कि पूरे मामले में संबंधित पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं।
नागरिक स्वतंत्रता बनाम कानून-व्यवस्था
प्रभात ध्यानी हिरासत केस का यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब विभिन्न आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा एजेंसियों की भूमिका को लेकर लगातार बहस चल रही है।
एक ओर सरकार और पुलिस कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी का हवाला देती हैं, वहीं दूसरी ओर नागरिक अधिकारों से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध और स्वतंत्र आवाजाही नागरिकों के मूल अधिकार हैं।
उत्तराखंड हाईकोर्ट की प्रारंभिक टिप्पणियां इसी संवैधानिक संतुलन की ओर संकेत करती हैं, जहां अदालत यह जानना चाहती है कि किसी नागरिक की स्वतंत्रता पर रोक लगाने के लिए पुलिस के पास पर्याप्त और वैध कानूनी आधार था या नहीं।
16 सितंबर को होगी अगली सुनवाई
फिलहाल हाईकोर्ट ने राज्य सरकार, पुलिस और अन्य संबंधित पक्षों को चार सप्ताह के भीतर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसके बाद मामले की अगली सुनवाई 16 सितंबर को होगी।
अब इस मामले पर सभी की नजरें टिकी हैं, क्योंकि अदालत का अंतिम निर्णय न केवल प्रभात ध्यानी की हिरासत की वैधता तय करेगा, बल्कि भविष्य में शांतिपूर्ण प्रदर्शन, नागरिक स्वतंत्रता और पुलिस की शक्तियों की सीमा को लेकर भी महत्वपूर्ण न्यायिक मार्गदर्शन दे सकता है।
