Uttarakhand High Court News Nainital: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने आयुर्वेद विश्वविद्यालय के शिक्षकों के बकाया वेतन और करियर एडवांसमेंट स्कीम (CAS) के भुगतान को लेकर राज्य सरकार को कड़े निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने स्पष्ट कहा है कि जब शिक्षक नियमित रूप से अपनी सेवाएं दे रहे हैं, तो उनका वेतन रोका जाना न्यायसंगत नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने आयुर्वेद विश्वविद्यालय शिक्षक वेल्फेयर संघ की याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार को निर्देश दिया कि अगली सुनवाई से पहले आवश्यक धनराशि हर हाल में जारी की जाए। मामले की अगली सुनवाई 9 मार्च 2026 को तय की गई है।
छह महीने से वेतन लंबित, शिक्षकों पर आर्थिक संकट
याचिका में अदालत को बताया गया कि विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद ने 9 दिसंबर 2025 को हुई बैठक में यह निर्णय लिया था कि करियर एडवांसमेंट स्कीम से जुड़े विवादों के अंतिम समाधान तक अंतरिम व्यवस्था के तहत शिक्षकों को छह महीने का बकाया वेतन दिया जाएगा।
हालांकि, विश्वविद्यालय प्रशासन ने दलील दी कि शासन से बजट जारी न होने के कारण यह निर्णय लागू नहीं हो सका।
संघ की ओर से कहा गया कि शिक्षक कई महीनों से बिना वेतन के कार्य कर रहे हैं। नियमित सेवाएं देने के बावजूद भुगतान न होने से शिक्षकों के सामने गंभीर आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया है।
हाईकोर्ट ने सरकार की दलील खारिज की
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि वित्त सचिव, जो कार्यकारी परिषद के सदस्य भी हैं, ने करियर एडवांसमेंट स्कीम का लाभ देने पर कुछ आपत्तियां दर्ज कराई थीं।
लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि जब कार्यकारी परिषद अंतरिम व्यवस्था के रूप में निर्णय ले चुकी है, तब सरकार को वर्तमान वेतन और बकाया राशि रोकने का कोई अधिकार नहीं है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि शिक्षकों की सेवाओं का प्रतिफल उन्हें समय पर मिलना चाहिए और प्रशासनिक या तकनीकी आपत्तियों के आधार पर वेतन रोका जाना अनुचित है।
9 मार्च से पहले अनुपालन रिपोर्ट पेश करने का आदेश
खंडपीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि 9 मार्च 2026 से पहले आवश्यक फंड जारी कर शिक्षकों को भुगतान सुनिश्चित किया जाए। साथ ही, आदेश के अनुपालन की विस्तृत रिपोर्ट अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने को कहा गया है।
यह उत्तराखंड हाईकोर्ट आदेश राज्य में शैक्षणिक संस्थानों में वेतन भुगतान से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है।
सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य को भी राहत: मेडिकल बिल भुगतान के निर्देश
इसी दिन एक अन्य मामले में हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य को बड़ी राहत दी। अदालत ने स्वास्थ्य विभाग को निर्देश दिया कि चिकित्सा प्रतिपूर्ति के लंबित बिलों का तत्काल भुगतान किया जाए।
यह मामला श्री गुरु राम राय डिग्री कॉलेज, देहरादून के सेवानिवृत्त प्रिंसिपल विनय आनंद बौराई से संबंधित है।
वर्ष 2022 में सेवानिवृत्त होने के बाद वे गंभीर बीमारी से ग्रस्त हो गए थे और गुरुग्राम के एक निजी अस्पताल में उनका लंबा इलाज चला। उपचार के बाद उन्होंने 11,12,992 रुपये के मेडिकल बिलों की प्रतिपूर्ति के लिए आवेदन किया था।
सरकार ने तकनीकी खामियों का हवाला देते हुए उनके दावे को अस्वीकार कर दिया था।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि यदि किसी कर्मचारी से स्वास्थ्य योजना का अंशदान देरी से या एकमुश्त लिया गया है, तो इस आधार पर उसके इलाज का खर्च देने से इनकार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने माना कि सरकारी कर्मचारियों और सेवानिवृत्त अधिकारियों को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है। तकनीकी आधार पर वास्तविक चिकित्सा दावों को खारिज करना न्यायोचित नहीं है।
प्रशासनिक जवाबदेही पर जोर
दोनों मामलों में हाईकोर्ट ने प्रशासनिक जवाबदेही और कर्मचारियों के अधिकारों की सुरक्षा पर जोर दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आयुर्वेद विश्वविद्यालय वेतन मामला और सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य की मेडिकल प्रतिपूर्ति से जुड़े आदेश भविष्य में ऐसे मामलों में मार्गदर्शक सिद्ध हो सकते हैं।
व्यापक असर की संभावना
शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े इन मामलों में हाईकोर्ट का हस्तक्षेप राज्य सरकार के लिए स्पष्ट संदेश है कि कर्मचारियों के वैधानिक अधिकारों से समझौता नहीं किया जा सकता।
जहां एक ओर शिक्षकों को वेतन भुगतान सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है, वहीं दूसरी ओर सेवानिवृत्त अधिकारी को चिकित्सा प्रतिपूर्ति का अधिकार दिलाने का आदेश प्रशासनिक संवेदनशीलता की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
उत्तराखंड हाईकोर्ट आदेश (Uttarakhand High Court News) ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि कर्मचारियों के वेतन और स्वास्थ्य अधिकारों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
9 मार्च की अगली सुनवाई से पहले सरकार को दोनों मामलों में अनुपालन रिपोर्ट पेश करनी होगी। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि राज्य सरकार कितनी तत्परता से अदालत के निर्देशों का पालन करती है।

