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नई दिल्ली: खाने की आदतें बढ़ा सकती हैं धरती का तापमान

दुनिया जिस रफ्तार से बदलती खाद्य प्रणाली (Global Food System) को अपना रही है, वह केवल मानव स्वास्थ्य के लिए ही नहीं बल्कि धरती के भविष्य के लिए भी गंभीर खतरा बनती जा रही है। एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि यदि आज ही जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) से होने वाला पूरा उत्सर्जन रोक भी दिया जाए, तब भी मौजूदा खाद्य प्रणालियां वैश्विक तापमान को पेरिस समझौते में तय 2 डिग्री सेल्सियस की सीमा से आगे धकेल सकती हैं

यह चौंकाने वाला निष्कर्ष प्रतिष्ठित जर्नल Frontiers in Science में प्रकाशित एक व्यापक समीक्षा (Review Study) में सामने आया है।


खाद्य प्रणाली, स्वास्थ्य और जलवायु: गहराता संकट

अध्ययन में कहा गया है कि आज की खाद्य व्यवस्था मुख्य रूप से मुनाफा-आधारित (Profit-led) है, जो लोगों को अधिक खाने, गलत खाने और अस्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करती है। यही व्यवस्था—

  • मोटापे (Obesity) की महामारी
  • गैर-संचारी रोगों (NCDs)
  • और पर्यावरणीय क्षति

तीनों को एक साथ बढ़ावा दे रही है।

विशेषज्ञों के अनुसार, जिस तरह का फूड एनवायरनमेंट आज विकसित हुआ है, उसमें उच्च कैलोरी और कम फाइबर वाले खाद्य पदार्थों की भरमार है, खासतौर पर अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स (UPFs)


अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड: सेहत और पर्यावरण दोनों पर वार

रिसर्च बताती है कि कई अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स—

  • अत्यधिक कैलोरी युक्त होते हैं
  • लंबे समय तक तृप्ति नहीं देते
  • वजन बढ़ाने और मोटापे को बढ़ावा देते हैं

लेकिन समस्या केवल यहीं खत्म नहीं होती। इन्हीं खाद्य पदार्थों की उत्पादन श्रृंखला, खासकर पशु-आधारित खाद्य उत्पादन, भारी मात्रा में—

  • ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन
  • भूमि और जल संसाधनों पर दबाव
  • वनों की कटाई

जैसी समस्याएं पैदा करती है।


ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के प्रो. जेफ हॉली की अगुवाई में अध्ययन

इस व्यापक समीक्षा का नेतृत्व ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल के प्रोफेसर जेफ हॉली (Prof Jeff Holly) ने किया है। अध्ययन में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि—

“खाद्य वातावरण में सुधार करने से एक साथ दोहरे लाभ मिल सकते हैं—बेहतर मानव स्वास्थ्य और जलवायु संरक्षण।”

उनका कहना है कि मौजूदा खाद्य प्रणाली पिछले चार दशकों में खपत-आधारित सोच के चलते पूरी तरह बदल चुकी है, और यही मोटापे का सबसे बड़ा कारण है।


नीतिगत समाधान: टैक्स, सब्सिडी और चेतावनी लेबल

अध्ययन केवल समस्या की पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि ठोस नीतिगत सुझाव भी देता है। शोधकर्ताओं ने सरकारों से अपील की है कि वे—

  • स्वस्थ खाद्य पदार्थों पर सब्सिडी दें
  • अत्यधिक अस्वस्थ खाद्य पदार्थों पर टैक्स लगाएं
  • पैकेज्ड जंक फूड पर चेतावनी लेबल अनिवार्य करें
  • बच्चों और कम आय वाले समुदायों को लक्षित आक्रामक विज्ञापनों पर रोक लगाएं

शोधकर्ताओं का मानना है कि ये कदम न केवल मोटापे की समस्या को कम करेंगे, बल्कि जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी मददगार साबित होंगे।


क्या वज़न घटाने की दवाएं समाधान हैं?

अध्ययन में यह भी स्पष्ट किया गया है कि वज़न घटाने वाली दवाओं (Weight-loss drugs) को मोटापे का अंतिम समाधान मानना एक भ्रम है।

शोधकर्ताओं के अनुसार—

  • ये दवाएं केवल लक्षणों पर काम करती हैं
  • खाद्य प्रणाली की मूल समस्या को नहीं बदलतीं
  • और जलवायु पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को भी नहीं रोकतीं

यानी, यदि फूड सिस्टम वैसा ही बना रहा, तो दवाएं भी दीर्घकालिक समाधान नहीं दे पाएंगी।


मानव और ग्रह—दोनों के लिए जरूरी बदलाव

प्रो. जेफ हॉली ने कहा—

“मोटापा एक जटिल बीमारी है, लेकिन इसका सबसे बड़ा कारण पिछले 40 वर्षों में खाद्य प्रणाली का उपभोग-केंद्रित रूपांतरण है। दवाओं या सर्जरी के बजाय यदि हम इस मूल कारण को संबोधित करें, तो इससे इंसानों और धरती—दोनों को फायदा होगा।”

यह बयान इस बात को रेखांकित करता है कि स्वास्थ्य नीति और जलवायु नीति को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता


पेरिस समझौते के लक्ष्य पर मंडराता खतरा

पेरिस जलवायु समझौते के तहत दुनिया ने यह लक्ष्य रखा है कि वैश्विक तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखा जाए। लेकिन यह अध्ययन चेतावनी देता है कि यदि खाद्य प्रणालियों में सुधार नहीं किया गया, तो—

  • यह लक्ष्य हासिल करना बेहद कठिन हो जाएगा
  • और जलवायु संकट और गहरा सकता है

निष्कर्ष: खाने की थाली से तय होगा धरती का भविष्य

यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि हम क्या खाते हैं, कैसे खाते हैं और क्यों खाते हैं—यह सब अब केवल व्यक्तिगत पसंद का मामला नहीं रहा
यह सीधे तौर पर—

  • वैश्विक स्वास्थ्य
  • पर्यावरण संतुलन
  • और जलवायु भविष्य

से जुड़ चुका है।

यदि सरकारें, उद्योग और समाज मिलकर सतत (Sustainable) खाद्य प्रणाली की ओर नहीं बढ़े, तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

By Bhaskar

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