नई दिल्ली, 11 दिसंबर: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में सर्दियों के आगमन के साथ वायु गुणवत्ता एक बार फिर चिंताजनक स्तर पर पहुँच गई है। बुधवार को शहर का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 288 दर्ज किया गया, जिसे केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने ‘खराब’ श्रेणी में वर्गीकृत किया है। राजधानी में पिछले चार दिनों से लगातार प्रदूषण का स्तर ‘मध्यम’ से ‘खराब’ श्रेणी के बीच झूल रहा है, जो यह संकेत देता है कि मौसम और स्थानीय प्रदूषण स्रोतों के संयुक्त प्रभाव ने हालात को फिर से बिगाड़ दिया है।
सर्दी बढ़ते ही हवा और जहरीली
दिल्ली में हर वर्ष नवंबर-दिसंबर के बीच हवा की गुणवत्ता सबसे खराब देखी जाती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि तापमान गिरने के साथ हवा की गति धीमी पड़ जाती है, जिससे प्रदूषक ऊपर उठने की बजाय जमीन के पास ही जमने लगते हैं।
आईएमडी के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक के अनुसार, “दिल्ली में हवा की औसत गति कई दिनों से कम है। इस कारण PM2.5 और PM10 जैसे अति सूक्ष्म कण ऊपर नहीं जा पाते। इससे प्रदूषण का स्तर तेजी से बढ़ता है।”
दिल्ली-एनसीआर में चल रही हल्की धुंध, वाहन उत्सर्जन, औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला धुआँ, कूड़ा-कचरा जलाना और निर्माण कार्य प्रदूषण की मुख्य वजह बताए जा रहे हैं।
CPCB का वर्गीकरण क्या कहता है?
CPCB के अनुसार, AQI को छह श्रेणियों में बांटा गया है—
0–50: अच्छा
51–100: संतोषजनक
101–200: मध्यम
201–300: खराब
301–400: बहुत खराब
401–500: गंभीर
दिल्ली का मौजूदा AQI (288) ‘खराब श्रेणी’ में आता है, जिसका मतलब है कि सामान्य लोगों को भी सांस लेने में असुविधा हो सकती है, जबकि पहले से सांस या हृदय संबंधी बीमारी वाले लोगों के लिए जोखिम और अधिक बढ़ जाता है।
PM2.5 बना सबसे बड़ा खतरा
दिल्ली में बुधवार को सबसे अधिक चिंताजनक स्तर PM2.5 पार्टिकुलेट मैटर का रहा। कई स्टेशनों पर यह सुरक्षित सीमा से 4–5 गुना ऊपर रिकॉर्ड किया गया।
PM2.5 इतने छोटे कण होते हैं कि यह सीधे फेफड़ों और रक्तप्रवाह तक पहुँच जाते हैं। यही कारण है कि डॉक्टर इसे “धीमा और खतरनाक हत्यारा” मानते हैं।
दिल्ली के विभिन्न इलाकों में हालात
CPCB और SAFAR के आंकड़ों के मुताबिक—
आनंद विहार, आएटीओ, राजौरी गार्डन और विवेक विहार जैसे इलाकों में प्रदूषण का स्तर औसत से ज्यादा खराब दर्ज हुआ।
नई दिल्ली क्षेत्र, चाणक्यपुरी, लोधी रोड जैसे अपेक्षाकृत खुले और हरित क्षेत्रों में AQI थोड़ा कम रहा, लेकिन फिर भी ‘खराब’ श्रेणी से बाहर नहीं निकला।
नोएडा, गाजियाबाद और गुरुग्राम में भी हवा की गुणवत्ता दिल्ली के समान रही।
विशेषज्ञों की चेतावनी: ‘सावधानी बेहद जरूरी’
प्रसिद्ध फेफड़ा रोग विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि खराब AQI स्तर का असर केवल बुजुर्गों या बच्चों पर नहीं पड़ता, बल्कि पूरी आबादी इसकी चपेट में आती है।
एम्स के एक वरिष्ठ चिकित्सक के अनुसार,
“जो लोग सुबह-सुबह दौड़ने या एक्सरसाइज के लिए बाहर निकलते हैं, वे इस मौसम में दोगुना जोखिम उठा रहे हैं। तेज सांसों के साथ प्रदूषक बेहद तेजी से फेफड़ों में प्रवेश करते हैं।”
डॉक्टरों ने खासकर अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, हृदय रोग और एलर्जी से पीड़ित लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी है।
सरकार की निगरानी, पर सुधार की रफ्तार धीमी
दिल्ली सरकार और केंद्र द्वारा लागू की गई GRAP (Graded Response Action Plan) की कार्रवाईयों के बावजूद प्रदूषण का स्तर उम्मीद के अनुरूप नियंत्रण में नहीं आ पा रहा है।
GRAP के तहत—
निर्माण और ध्वस्तीकरण कार्यों पर पाबंदी
सड़क पर पानी का छिड़काव
प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर सख्ती
डीजल जेनरेटर पर प्रतिबंध
जैसे उपाय शामिल हैं।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक क्षेत्रीय स्रोतों, जैसे पंजाब-हरियाणा के खेतों में पराली जलाना और एनसीआर के औद्योगिक उत्सर्जन पर काबू नहीं पाया जाता, तब तक दिल्ली की हवा पूरी तरह साफ होना मुश्किल है।
जनता क्या कर सकती है?
विशेषज्ञों ने जनता को भी प्रदूषण नियंत्रण में भूमिका निभाने की सलाह दी है।
निजी वाहनों का कम इस्तेमाल करें
कार-पूल या सार्वजनिक परिवहन अपनाएं
कचरा या प्लास्टिक न जलाएं
घर में एयर प्यूरीफायर का उपयोग करें
बाहर निकलते समय मास्क पहनें
सुबह-शाम भारी आउटडोर वर्कआउट से बचें
क्या आने वाले दिनों में राहत मिलेगी?
आईएमडी ने फिलहाल अगले दो दिनों में हवा की गुणवत्ता में बड़े सुधार की संभावना से इनकार किया है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि “जब तक हवा की गति नहीं बढ़ती या बारिश नहीं होती, तब तक स्थिति में ध्यान देने योग्य परिवर्तन की उम्मीद कम है।”
अगले 48 घंटों तक प्रदूषण स्तर ‘खराब’ से ‘बहुत खराब’ श्रेणी के बीच रह सकता है।
निष्कर्ष
दिल्ली का 288 का AQI सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि राजधानी में बढ़ते पर्यावरणीय खतरे का चेतावनी संकेत है। हवा में मौजूद प्रदूषक न केवल तत्काल स्वास्थ्य पर असर डालते हैं, बल्कि लंबे समय में फेफड़ों की क्षमता, मानसिक स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा तक को प्रभावित करते हैं।
जब तक सरकार, एजेंसियाँ और जनता मिलकर रणनीतिक और दीर्घकालिक कदम नहीं उठाते, दिल्ली की सर्दियां हर वर्ष इसी तरह धुंध और ज़हरीली हवा की मार झेलती रहेंगी।
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