नई दिल्ली, 8 दिसंबर (भाषा): उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को देश में कानूनी प्रतिनिधित्व में लैंगिक संतुलन सुनिश्चित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक आदेश जारी करते हुए सभी राज्य विधिज्ञ परिषदों में महिला वकीलों के लिए 30 प्रतिशत सीटें आरक्षित रखने का निर्देश दिया। यह आदेश उन राज्यों पर लागू होगा जहां अभी तक बार काउंसिल चुनाव प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने यह आदेश सुनाते हुए कहा कि वकालत पेशे में महिला अधिवक्ताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन निर्णय-निर्माण से जुड़ी संस्थाओं में उनकी भागीदारी अभी भी अत्यंत कम है। ऐसे में आरक्षण का यह कदम केवल प्रतिनिधित्व बढ़ाने का प्रयास नहीं, बल्कि कानूनी संस्थाओं के लोकतांत्रिक चरित्र को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।
चुनाव वाले राज्यों के लिए अलग व्यवस्था: 20% अनिवार्य, 10% को-ऑप्शन से भरी जाएं
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उन राज्य विधिज्ञ परिषदों में जहां इस वर्ष चुनाव प्रस्तावित हैं, वहां सीटों के आरक्षण को लागू करने के लिए विशेष व्यवस्था अपनाई जाएगी:
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20 प्रतिशत सीटें अनिवार्य रूप से महिला उम्मीदवारों के लिए आरक्षित होंगी।
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यदि पर्याप्त महिला वकील चुनाव मैदान में उतरने के लिए उपलब्ध न हों,
तो शेष 10 प्रतिशत सीटें ‘विशेष चयन’ (को-ऑप्शन) की प्रक्रिया से योग्य महिला अधिवक्ताओं से भरी जाएंगी।
पीठ ने कहा कि चुनावी प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता और पारदर्शिता को मजबूत करता है। को-ऑप्शन की व्यवस्था उन परिस्थितियों में विकल्प के रूप में दी गई है जहां किसी विशेष क्षेत्र में महिलाओं की संख्या कम होने के कारण सीटें रिक्त रह जाने की आशंका हो।
“लैंगिक प्रतिनिधित्व कोई विकल्प नहीं, अनिवार्य आवश्यकता है” — सुप्रीम कोर्ट
सुनवाई के दौरान पीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि कानूनी पेशे में महिलाओं के बेहतर प्रतिनिधित्व की आवश्यकता को अब केवल ‘सिफारिश’ नहीं, एक संरचनात्मक सुधार के रूप में देखा जाना चाहिए। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा:
“बार काउंसिल्स न्याय व्यवस्था की रीढ़ हैं। यदि उनके निर्णयों में समाज के सभी वर्गों की आवाज प्रतिनिधित्व नहीं करती, तो न्यायिक तंत्र का संतुलन कमजोर होता है। महिला वकीलों को नेतृत्व भूमिकाओं से दूर नहीं रखा जा सकता।”
न्यायालय ने यह भी कहा कि कई राज्यों में आज भी बार काउंसिलों में महिला सदस्यों की संख्या दो से पाँच प्रतिशत तक ही सीमित है, जो कानूनी पेशे के व्यापक लोकतांत्रिक चरित्र के विपरीत है।
पृष्ठभूमि: महिला वकीलों की कम भागीदारी पर लगातार उठते रहे हैं सवाल
देश में वकीलों की कुल संख्या के आंकड़ों के अनुसार महिलाओं की भागीदारी लगभग 27–30 प्रतिशत तक बताई जाती है, जबकि बार काउंसिलों और बार एसोसिएशनों जैसे निर्णायक संस्थानों में यह अनुपात काफी कम है।
कई राज्यों में बार काउंसिल की 25 या 30 सदस्यीय समितियों में केवल 1 या 2 ही महिला सदस्य चुनी जाती हैं। इससे:
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महिलाओं की नीतिगत निर्णयों में भागीदारी प्रभावित,
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वकालत पेशे में लैंगिक असमानता कायम,
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युवा महिला वकीलों में नेतृत्व भूमिकाओं के अवसर सीमित होते हैं।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने भी पिछले वर्षों में कई रिपोर्टों में इस असंतुलन पर चिंता जताई थी और राज्यों से महिलाओं के लिए उपयुक्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए प्रोत्साहित किया था।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश क्यों महत्वपूर्ण है?
इस फैसले के कई व्यापक प्रभाव हो सकते हैं:
1. नेतृत्व पदों में महिलाओं की संख्या बढ़ेगी
राज्य विधिज्ञ परिषदें वकीलों के लाइसेंसिंग, चुनावी सूची, अनुशासनात्मक कार्रवाई और नियामक प्रक्रियाओं की मुख्य संस्था हैं। महिलाओं की बढ़ी भागीदारी से इन संस्थाओं का निर्णय अधिक समावेशी होगा।
2. युवा महिला वकीलों को प्रेरणा मिलेगी
महिला अधिवक्ताओं को अब वरिष्ठ नेतृत्व तक पहुंचने के लिए अधिक अवसर मिलेंगे। इससे वकालत पेशे में बने रहने की प्रेरणा भी बढ़ेगी।
3. कोर्ट परिसर में बेहतर लैंगिक माहौल का निर्माण
कई अध्ययन बताते हैं कि महिला प्रतिनिधित्व बढ़ने पर कार्यस्थल के व्यवहार, अनुशासन और संवेदनशीलता में सकारात्मक बदलाव आते हैं।
4. भविष्य में बड़े सुधारों का मार्ग प्रशस्त
कानूनी शिक्षा संस्थानों, जिला बार एसोसिएशनों और बार काउंसिल ऑफ इंडिया तक अन्य सुधारों का विस्तार संभव है।
राज्य बार काउंसिलों से स्थिति रिपोर्ट तलब
न्यायालय ने सभी संबंधित राज्य विधिज्ञ परिषदों को आदेश दिया है कि वे:
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आरक्षण लागू करने की अनुपालन रिपोर्ट,
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चुनाव प्रक्रिया में की गई व्यवस्थाएं,
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को-ऑप्शन के प्रावधान का उपयोग कैसे किया जाएगा,
इन सभी बिंदुओं पर विस्तृत जानकारी अदालत में प्रस्तुत करें। कोर्ट ने कहा कि इस व्यवस्था को लागू करने में किसी भी प्रकार की देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
मामले की अगली सुनवाई के लिए तारीख जल्द निर्धारित की जाएगी, जिसमें सभी राज्यों द्वारा उठाए गए कदमों की समीक्षा की जाएगी।
बार काउंसिलों की प्रतिक्रिया
कई वरिष्ठ अधिवक्ता और कानूनी विशेषज्ञों ने इस कदम का स्वागत किया है। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश वकालत पेशे में लंबे समय से महसूस की जा रही लैंगिक असंतुलन की समस्या का समाधान कर सकता है।
एक वरिष्ठ महिला अधिवक्ता ने कहा:
“यह निर्णय बार काउंसिलों में महिलाओं की आवाज को मजबूती देगा। यह केवल आरक्षण नहीं, बल्कि न्यायिक व्यवस्था को अधिक संवेदनशील और प्रतिनिधिक बनाने का प्रयास है।”
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक आदेश देश के कानूनी तंत्र में लैंगिक समानता की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। राज्य विधिज्ञ परिषदें न सिर्फ वकीलों का पंजीकरण और अनुशासन देखती हैं, बल्कि न्यायिक ढांचे के महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में काम करती हैं। ऐसे में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने से पूरी व्यवस्था का लोकतांत्रिक ढांचा और सुदृढ़ होगा।

