देहरादून: उत्तराखंड में जंगली जानवरों से खेती संकट लगातार गंभीर होता जा रहा है। पहाड़ी इलाकों से लेकर कई मैदानी क्षेत्रों तक बंदर, जंगली सूअर, नीलगाय और अन्य वन्यजीव किसानों की फसलों को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं। हालात ऐसे बन गए हैं कि कई गांवों में किसान खेती छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं।
राज्य के पलायन आयोग की विभिन्न रिपोर्टों में भी यह बात सामने आ चुकी है कि जंगली जानवरों द्वारा फसलों को नुकसान पहुंचना ग्रामीण क्षेत्रों से हो रहे पलायन का एक बड़ा कारण बन गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं किया गया तो पहाड़ों में खेती का संकट और गहरा सकता है।
किसानों के लिए बढ़ती चुनौती
उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में खेती पहले से ही कठिन परिस्थितियों में की जाती है। सीमित कृषि भूमि, सिंचाई की कमी और मौसम की अनिश्चितता के बीच किसान किसी तरह खेती करते हैं।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जंगली जानवरों की संख्या बढ़ने की आशंका के चलते किसानों की परेशानी कई गुना बढ़ गई है। राज्य के कई जिलों से मिली रिपोर्टों में सामने आया है कि बंदर, जंगली सूअर, साही और नीलगाय जैसे वन्यजीव रातों-रात खेतों में खड़ी फसलों को नष्ट कर देते हैं।
कई गांवों में किसान रातभर खेतों की रखवाली करने को मजबूर हैं, लेकिन इसके बावजूद फसल को बचा पाना मुश्किल हो जाता है। इस स्थिति ने किसानों की आर्थिक स्थिति पर भी गंभीर असर डाला है।
पलायन की बड़ी वजह बन रहा फसल नुकसान
उत्तराखंड में ग्रामीण इलाकों से पलायन लंबे समय से एक बड़ी समस्या रही है। पलायन आयोग की रिपोर्टों के अनुसार खेती में लगातार नुकसान होने के कारण कई किसान गांव छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।
विशेष रूप से पहाड़ी जिलों में खेती छोड़ने के पीछे जंगली जानवरों का आतंक एक प्रमुख कारण बनकर उभरा है। जब किसान मेहनत से बोई गई फसल को बचा नहीं पाते, तो खेती करना उनके लिए घाटे का सौदा बन जाता है।
इसके चलते कई गांवों में कृषि गतिविधियां धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं और नई पीढ़ी खेती से दूरी बना रही है।
फसलों की सुरक्षा के लिए घेरबाड़ सबसे कारगर उपाय
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि जंगली जानवरों से फसलों की सुरक्षा के लिए खेतों की मजबूत घेरबाड़ यानी फेंसिंग सबसे प्रभावी उपाय है।
घेरबाड़ के लिए कई तकनीकों का उपयोग किया जाता है, जिनमें तारबाड़, सोलर फेंसिंग और अन्य आधुनिक उपाय शामिल हैं। इन उपायों से खेतों को जंगली जानवरों से काफी हद तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
हालांकि राज्य के अधिकांश किसानों के लिए अपने स्तर पर फेंसिंग कराना आर्थिक रूप से संभव नहीं है। ऐसे में किसान सरकार से आर्थिक सहायता की उम्मीद करते हैं ताकि बड़े स्तर पर खेतों की घेरबाड़ की जा सके।
बजट की कमी बनी बड़ी बाधा
फसलों की सुरक्षा के लिए फेंसिंग को कारगर उपाय माना जा रहा है, लेकिन इसके लिए पर्याप्त बजट उपलब्ध न होना राज्य सरकार के सामने बड़ी चुनौती बन गया है।
उत्तराखंड में पहले खेतों की घेरबाड़ से जुड़ी एक योजना संचालित की जा रही थी, जिसके तहत किसानों को आंशिक आर्थिक सहायता दी जाती थी। लेकिन बाद में यह योजना बंद कर दी गई।
इसके बाद राज्य सरकार ने केंद्र सरकार से बड़े बजट की मांग की थी ताकि बड़े स्तर पर खेतों की घेरबाड़ का काम शुरू किया जा सके।
90 करोड़ की घोषणा, लेकिन फिलहाल 25 करोड़ ही मिले
इस मामले में कुछ समय पहले केंद्रीय कृषि मंत्री की ओर से उत्तराखंड के लिए 90 करोड़ रुपये की सहायता देने के संकेत दिए गए थे। इससे किसानों और कृषि विभाग को उम्मीद जगी थी कि राज्य में बड़े पैमाने पर फेंसिंग का काम शुरू हो सकेगा।
हालांकि घोषणा के करीब दो महीने बाद तक पूरी राशि राज्य को नहीं मिल पाई है। फिलहाल केंद्र सरकार की ओर से केवल 25 करोड़ रुपये की पहली किस्त दिए जाने की बात कही गई है।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए 90 करोड़ रुपये भी बहुत बड़ी राशि नहीं थी। लेकिन अगर यह राशि समय पर मिल जाती तो कई जिलों में किसानों को राहत मिल सकती थी।
विशेषज्ञों की राय
कृषि विशेषज्ञ दीपक करगेती का कहना है कि उत्तराखंड में खेती को जंगली जानवरों से बचाने के लिए बड़े स्तर पर फेंसिंग की आवश्यकता है।
उनके अनुसार यदि पर्याप्त बजट उपलब्ध कराया जाए तो किसानों की एक बड़ी समस्या का समाधान हो सकता है और खेती को नुकसान से बचाया जा सकता है।
सरकार का पक्ष
इस पूरे मामले पर उत्तराखंड सरकार का कहना है कि किसानों की समस्या को लेकर लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।
राज्य के कृषि मंत्री गणेश जोशी के अनुसार केंद्र सरकार ने राज्य को 90 करोड़ रुपये देने की घोषणा की थी, लेकिन फिलहाल 25 करोड़ रुपये की पहली किस्त जारी की जा रही है।
उन्होंने कहा कि इस राशि से भी कुछ क्षेत्रों में फेंसिंग का काम शुरू कर किसानों को राहत देने की कोशिश की जाएगी।
सरकार का यह भी कहना है कि यदि भविष्य में और बजट उपलब्ध होता है तो राज्य में बड़े स्तर पर खेतों की घेरबाड़ की योजना को आगे बढ़ाया जाएगा।
किसानों की बढ़ती चिंता
जमीनी स्तर पर किसान अब भी राहत का इंतजार कर रहे हैं। कई किसानों का कहना है कि जब तक बड़े पैमाने पर फेंसिंग नहीं की जाएगी, तब तक जंगली जानवरों से फसलों को बचाना मुश्किल रहेगा।
किसानों के अनुसार लगातार नुकसान के कारण खेती से उनका भरोसा कम होता जा रहा है और नई पीढ़ी कृषि कार्य से दूर होती जा रही है।
खेती बचाने के लिए दीर्घकालिक योजना जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में खेती को बचाने के लिए जंगली जानवरों से फसलों की सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी।
इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार को मिलकर दीर्घकालिक योजना बनानी होगी और पर्याप्त बजट की व्यवस्था करनी होगी।
यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए तो उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में खेती का संकट और गहरा सकता है और ग्रामीण पलायन की समस्या भी बढ़ सकती है।

