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उत्तराखंड हाईकोर्ट से कर्मचारियों को राहत, पेंशन रोकने वाले आदेश पर लगी रोक

उत्तराखंड वर्कचार्ज कर्मचारियों की पेंशन

नैनीताल | उत्तराखंड वर्कचार्ज कर्मचारियों की पेंशन: राज्य में लोक निर्माण विभाग (PWD) और सिंचाई विभाग के हजारों नियमित व वर्कचार्ज कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने वित्त विभाग के 16 जनवरी 2026 को जारी उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसके तहत 2016 के बाद नियमित हुए कर्मचारियों को पेंशन के दायरे से बाहर कर दिया गया था। इसके साथ ही पहले से पेंशन पा रहे कई सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पेंशन भी बंद कर दी गई थी।

हाईकोर्ट ने इस मामले को गंभीर मानते हुए राज्य सरकार से चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। अदालत के इस फैसले को कर्मचारियों और उनके परिवारों के लिए एक बड़ी कानूनी जीत माना जा रहा है।


1980 से 2025 तक के कर्मियों की पेंशन पर पड़ा था असर

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि वर्ष 1980 से 2025 के बीच कार्यरत रहे कई सेवानिवृत्त कर्मचारी और उनके मृतक आश्रित लंबे समय से पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ प्राप्त कर रहे थे। लेकिन वित्त विभाग के आदेश के बाद अचानक इन सभी लाभों को बंद कर दिया गया।

इस फैसले से न केवल आर्थिक संकट पैदा हुआ, बल्कि उन परिवारों की आजीविका पर भी संकट खड़ा हो गया, जिनकी आय का एकमात्र सहारा पेंशन थी।


अवकाशकालीन पीठ में हुई सुनवाई

गुरुवार को इस मामले की सुनवाई अवकाशकालीन न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की एकल पीठ के समक्ष हुई। यह याचिका सेवानिवृत्त कर्मचारी राम सिंह सैनी और अन्य कर्मचारियों की ओर से दाखिल की गई थी।

अदालत ने प्रारंभिक सुनवाई के बाद माना कि मामला कर्मचारियों के मौलिक और वैधानिक अधिकारों से जुड़ा है, जिस पर विस्तृत सुनवाई आवश्यक है।


क्या था वित्त विभाग का 16 जनवरी का आदेश?

वित्त विभाग की ओर से 16 जनवरी 2026 को जारी कार्यालय आदेश में कहा गया था कि:

इस आदेश के लागू होते ही कई विभागों में पेंशन भुगतान रोक दिया गया, जिससे कर्मचारियों में भारी असंतोष फैल गया।


याचिकाकर्ताओं का पक्ष: आदेश मनमाना और असंवैधानिक

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए अधिवक्ता विनोद तिवारी ने अदालत को बताया कि यह आदेश मनमाना, भेदभावपूर्ण और न्यायिक आदेशों की अवहेलना है।

उन्होंने दलील दी कि जो कर्मचारी वर्ष 2021-22 में सेवानिवृत्त हुए, उन्हें पहले पेंशन का लाभ दिया गया, लेकिन बाद में बिना किसी पूर्व सूचना के उनकी पेंशन बंद कर दी गई। यह न केवल नियमों के खिलाफ है, बल्कि कर्मचारियों के साथ अन्याय भी है।


सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया गया हवाला

याचिकाकर्ताओं ने अपने पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2018 के ऐतिहासिक फैसले प्रेम सिंह बनाम उत्तर प्रदेश सरकार का हवाला दिया।

इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि:

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि राज्य सरकार का नया आदेश इस फैसले के सीधे तौर पर खिलाफ है।


हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी और अंतरिम राहत

हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि बिना पर्याप्त कानूनी आधार के पेंशन बंद करना कर्मचारियों के अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है। इसी आधार पर अदालत ने वित्त विभाग के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी।

अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक राज्य सरकार अपना जवाब दाखिल नहीं करती और मामले की अंतिम सुनवाई नहीं हो जाती, तब तक पेंशन रोकने वाला आदेश लागू नहीं होगा।


हजारों कर्मचारियों को मिली राहत

हाईकोर्ट के इस आदेश से PWD और सिंचाई विभाग के उन हजारों कर्मचारियों को राहत मिली है, जो लंबे समय से पेंशन को लेकर असमंजस और आर्थिक तनाव में थे। कर्मचारी संगठनों ने इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे न्याय की जीत बताया है।

उनका कहना है कि यदि यह आदेश लागू रहता, तो भविष्य में अन्य विभागों के कर्मचारियों की पेंशन पर भी खतरा मंडराने लगता।


आगे क्या?

अब सभी की निगाहें राज्य सरकार के जवाब पर टिकी हैं। सरकार को चार सप्ताह के भीतर यह स्पष्ट करना होगा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद पेंशन रोकने का निर्णय क्यों लिया गया।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार संतोषजनक जवाब नहीं दे पाती, तो यह मामला कर्मचारियों के पक्ष में स्थायी फैसला ले सकता है।


निष्कर्ष

कुल मिलाकर, उत्तराखंड वर्कचार्ज कर्मचारियों की पेंशन को लेकर हाईकोर्ट का यह फैसला राज्य सरकार के लिए एक अहम कानूनी चुनौती है। यह मामला न केवल पेंशन नीति से जुड़ा है, बल्कि कर्मचारियों के भरोसे और सामाजिक सुरक्षा से भी सीधा संबंध रखता है।

आने वाले हफ्तों में यह देखना अहम होगा कि सरकार किस आधार पर अपने फैसले का बचाव करती है और अदालत इस पर क्या अंतिम रुख अपनाती है।

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