Sonam Wangchuk NSA Case

नई दिल्ली: Sonam Wangchuk NSA Case में केंद्र सरकार ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट को स्पष्ट किया कि लद्दाख के जलवायु कार्यकर्ता Sonam Wangchuk को चिकित्सा आधार पर रिहा नहीं किया जा सकता। सरकार ने अदालत को बताया कि राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत जारी हिरासत आदेश के आधार अभी भी प्रभावी हैं और स्वास्थ्य कारणों से रिहाई “वांछनीय” नहीं है।

यह मामला जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान उठा, जहां अदालत ने पहले अधिकारियों से वांगचुक की बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए मेडिकल आधार पर रिहाई पर विचार करने को कहा था।


सॉलिसिटर जनरल की दलील

केंद्र की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल Tushar Mehta ने अदालत को बताया कि जेल मैनुअल के अनुसार वांगचुक की नियमित स्वास्थ्य जांच की गई है। उन्होंने कहा, “करीब 24 बार उनका मेडिकल चेकअप किया गया है। वे स्वस्थ और तंदुरुस्त हैं। उन्हें पाचन संबंधी समस्या और संक्रमण था, जिसका इलाज किया गया है।”

सरकार ने तर्क दिया कि यदि ऐसे मामलों में अपवाद बनाकर मेडिकल आधार पर रिहाई दी जाती है, तो इससे हिरासत संबंधी कानूनों के प्रभाव पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। Sonam Wangchuk NSA Case में केंद्र ने यह भी कहा कि जिन आधारों पर हिरासत आदेश पारित किया गया था, वे अब भी लागू हैं और परिस्थितियों में कोई मौलिक परिवर्तन नहीं हुआ है।


NSA के तहत हिरासत

Sonam Wangchuk को 26 सितंबर 2025 को हिरासत में लिया गया था। उन्हें फिलहाल जोधपुर सेंट्रल जेल में रखा गया है। यह कार्रवाई लद्दाख में राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर हुए प्रदर्शनों के बाद की गई थी।

सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, इन प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भड़क उठी थी, जिसमें चार लोगों की मौत हुई और 150 से अधिक लोग घायल हुए। प्रशासन ने आरोप लगाया कि वांगचुक ने इन प्रदर्शनों को भड़काने में भूमिका निभाई।

Sonam Wangchuk NSA Case में केंद्र ने कहा है कि हिरासत आदेश सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर जारी किया गया था।


‘GEN-Z’ को उकसाने का आरोप

केंद्र सरकार और लद्दाख प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया कि वांगचुक ने नेपाल और बांग्लादेश की तरह विरोध प्रदर्शनों के लिए ‘GEN-Z’ को उकसाने की कोशिश की थी।

सॉलिसिटर जनरल Tushar Mehta ने अदालत में कहा कि वांगचुक ने अपने सार्वजनिक बयानों में ‘अरब स्प्रिंग’ जैसे आंदोलनों का उल्लेख किया था। ‘अरब स्प्रिंग’ वह आंदोलन था, जिसके चलते पश्चिम एशिया के कई देशों में सरकारें बदल गई थीं। सरकार का तर्क है कि ऐसे संदर्भ युवाओं को संगठित कर अस्थिरता पैदा करने की दिशा में संकेत करते हैं।

Sonam Wangchuk NSA Case में केंद्र का कहना है कि इस प्रकार के बयानों और गतिविधियों को गंभीरता से लिया गया और इन्हीं आधारों पर NSA के तहत कार्रवाई की गई।


मेडिकल आधार पर रिहाई की मांग

वांगचुक के समर्थकों और परिजनों ने हाल ही में उनकी बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति का हवाला देते हुए मेडिकल आधार पर रिहाई की मांग की थी। अदालत ने भी पिछली सुनवाई में सरकार से इस पर विचार करने को कहा था।

हालांकि केंद्र ने अदालत में प्रस्तुत जवाब में स्पष्ट किया कि जेल प्रशासन ने नियमित स्वास्थ्य निगरानी की है और किसी गंभीर चिकित्सीय स्थिति की पुष्टि नहीं हुई है। सरकार ने यह भी कहा कि यदि आवश्यकता पड़ी तो उन्हें उन्नत चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी, लेकिन हिरासत से रिहाई उचित नहीं होगी।

Sonam Wangchuk NSA Case अब इस सवाल पर केंद्रित हो गया है कि क्या मेडिकल आधार हिरासत आदेश को शिथिल करने के लिए पर्याप्त है या नहीं।


कानूनी और राजनीतिक आयाम

राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत किसी भी व्यक्ति को अधिकतम 12 महीने तक बिना औपचारिक आरोप पत्र के हिरासत में रखा जा सकता है, बशर्ते कि प्रशासन को यह संतोष हो कि उसकी गतिविधियां सार्वजनिक व्यवस्था या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत इस मामले में स्वास्थ्य रिपोर्ट, हिरासत आदेश के आधार और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन साधने की कोशिश करेगी।

दूसरी ओर, लद्दाख में राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर राजनीतिक बहस तेज है। इस मुद्दे ने स्थानीय स्तर पर व्यापक समर्थन हासिल किया है, जबकि केंद्र सरकार का कहना है कि इस तरह की मांगों को संवैधानिक प्रक्रिया के तहत ही देखा जाएगा।


आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई के दौरान अदालत यह तय कर सकती है कि मेडिकल रिपोर्ट और सरकार की दलीलों के मद्देनजर कोई अंतरिम राहत दी जाए या नहीं।

Sonam Wangchuk NSA Case फिलहाल राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है। एक ओर सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था का हवाला दे रही है, तो दूसरी ओर समर्थक इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़कर देख रहे हैं।

अंततः अदालत का फैसला ही तय करेगा कि इस बहुचर्चित मामले में आगे की दिशा क्या होगी—क्या मेडिकल आधार पर राहत संभव है या फिर हिरासत आदेश यथावत रहेगा।

देश की नजरें अब सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां इस संवेदनशील और बहुआयामी मामले पर निर्णायक टिप्पणी सामने आ सकती है।

By Bhaskar

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