देहरादून। किसी भी परिवार के लिए अपने बच्चे को दुर्लभ बीमारी (रेयर डिजीज) से जूझते देखना सबसे कठिन परिस्थितियों में से एक होता है। ऐसी स्थिति में जब इलाज का खर्च लाखों रुपये तक पहुंच जाए, तो आर्थिक बोझ कई परिवारों की उम्मीदें भी तोड़ देता है। इसी संवेदनशील पहलू को केंद्र में रखते हुए देहरादून जिला प्रशासन ने एक महत्वपूर्ण और मानवीय निर्णय लिया है। अब रेयर डिजीज (दुर्लभ बीमारियों) से पीड़ित बच्चों के उपचार में धन की कमी बाधा नहीं बनेगी। यदि राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK) के तहत मिलने वाली सहायता पर्याप्त नहीं होती है, तो शेष आवश्यक राशि राइफल क्लब फंड से उपलब्ध कराई जाएगी।
शनिवार को जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान की अध्यक्षता में आयोजित समीक्षा बैठक में दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित बच्चों के उपचार, आर्थिक सहायता, रेफरल प्रक्रिया और उपचार की प्रगति का विस्तृत मूल्यांकन किया गया। बैठक का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि जिले का कोई भी बच्चा केवल आर्थिक संसाधनों के अभाव में जीवनरक्षक उपचार से वंचित न रह जाए।
बैठक में मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. मनोज शर्मा ने जानकारी दी कि भारत सरकार के राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK) के अंतर्गत जनपद देहरादून में अब तक 16 बच्चों की पहचान की जा चुकी है, जो विभिन्न प्रकार की रेयर डिजीज से पीड़ित हैं। इन बच्चों का उपचार देश के विभिन्न सुपर स्पेशियलिटी एवं विशेषज्ञ चिकित्सा संस्थानों में प्रस्तावित है। उन्होंने बताया कि अधिकांश दुर्लभ बीमारियों के इलाज में अत्यधिक खर्च आता है और कई मामलों में लंबे समय तक चिकित्सा एवं नियमित फॉलोअप की आवश्यकता होती है। ऐसे में सरकारी सहायता के साथ अतिरिक्त वित्तीय सहयोग भी कई परिवारों के लिए अनिवार्य हो जाता है।
समीक्षा बैठक के दौरान जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बच्चों की जिंदगी बचाना जिला प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि उपचार प्रक्रिया से जुड़ी किसी भी प्रशासनिक औपचारिकता के कारण इलाज में देरी नहीं होनी चाहिए। प्रत्येक पात्र बच्चे के दस्तावेज, रेफरल, अनुमोदन और आर्थिक सहायता से संबंधित सभी प्रक्रियाएं तय समय सीमा के भीतर पूरी की जाएं ताकि उपचार बिना किसी बाधा के जारी रह सके।
डीएम ने अधिकारियों को यह भी निर्देशित किया कि यदि किसी बच्चे के उपचार पर आरबीएसके के तहत उपलब्ध सहायता से अधिक खर्च आता है, तो ऐसे मामलों में जिला प्रशासन राइफल क्लब फंड से आवश्यक आर्थिक सहयोग उपलब्ध कराएगा। उन्होंने कहा कि किसी भी बच्चे के जीवन का मूल्य धन से कहीं अधिक है और आर्थिक अभाव किसी भी परिवार को इलाज से वंचित करने का कारण नहीं बनना चाहिए।
यह निर्णय केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशासन की संवेदनशील कार्यशैली का भी उदाहरण है। जिलाधिकारी ने स्वास्थ्य विभाग, जिला कार्यक्रम अधिकारी तथा संबंधित विभागों को निर्देश दिए कि सभी मामलों की नियमित मॉनिटरिंग की जाए। प्रत्येक बच्चे की चिकित्सा प्रगति पर लगातार नजर रखी जाए और अभिभावकों के साथ निरंतर संवाद बनाए रखा जाए ताकि यदि किसी स्तर पर कोई समस्या उत्पन्न होती है, तो उसका तत्काल समाधान किया जा सके।
बैठक में प्रत्येक चिन्हित बच्चे की वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति, उपचार की प्रगति, रेफरल प्रक्रिया, आर्थिक सहायता की उपलब्धता और अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं की बिंदुवार समीक्षा की गई। अधिकारियों से कहा गया कि शासन स्तर पर जिन मामलों में अतिरिक्त स्वीकृतियों की आवश्यकता हो, उन्हें प्राथमिकता के आधार पर भेजा जाए और सभी संबंधित विभाग आपसी समन्वय के साथ कार्य करें।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि रेयर डिजीज ऐसी बीमारियां होती हैं, जिनके मरीजों की संख्या अपेक्षाकृत कम होती है, लेकिन उनका उपचार अत्यंत जटिल और महंगा हो सकता है। कई मामलों में बच्चों को वर्षों तक विशेष दवाओं, नियमित जांच, सर्जरी अथवा उन्नत चिकित्सा सुविधाओं की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे में समय पर इलाज और आर्थिक सहयोग बच्चों के जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के साथ-साथ उनकी जान बचाने में भी निर्णायक भूमिका निभाता है।
देहरादून जिला प्रशासन की यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इससे उन परिवारों को राहत मिलेगी, जो इलाज के बढ़ते खर्च के कारण मानसिक और आर्थिक दबाव का सामना कर रहे हैं। प्रशासन का यह संदेश स्पष्ट है कि यदि कोई बच्चा गंभीर बीमारी से जूझ रहा है, तो उसके उपचार में धन की कमी बाधा नहीं बनने दी जाएगी।
विशेषज्ञों के अनुसार, राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK) के प्रभावी क्रियान्वयन के साथ यदि स्थानीय स्तर पर अतिरिक्त आर्थिक सहायता की व्यवस्था भी सुनिश्चित हो जाए, तो दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित बच्चों के उपचार की सफलता की संभावना और अधिक बढ़ जाती है। यही कारण है कि देहरादून प्रशासन का यह मॉडल भविष्य में अन्य जिलों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन सकता है।
बैठक में अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) के.के. मिश्रा, मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. मनोज शर्मा, जिला कार्यक्रम अधिकारी (बाल विकास) जितेंद्र कुमार सहित स्वास्थ्य एवं बाल विकास विभाग के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे। सभी अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि प्रत्येक मामले को संवेदनशीलता, तत्परता और जवाबदेही के साथ आगे बढ़ाया जाए।
रेयर डिजीज के लिए देहरादून जिला प्रशासन की यह पहल केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि उन परिवारों के लिए उम्मीद की नई किरण है, जो वर्षों से अपने बच्चों के इलाज के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जब प्रशासन स्वयं यह भरोसा देता है कि आर्थिक संसाधनों की कमी किसी बच्चे के उपचार में बाधा नहीं बनेगी, तो यह शासन की संवेदनशीलता और जनकल्याण के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का सशक्त उदाहरण बन जाता है।

