नई दिल्ली: देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था में ऐतिहासिक बदलाव की दिशा में केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को ‘विकसित भारत शिक्षा अधिनियमन विधेयक’ (Viksit Bharat Shiksha Adhikshan Bill) को मंजूरी दे दी है। इस विधेयक के तहत उच्च शिक्षा के लिए एक एकीकृत राष्ट्रीय नियामक की स्थापना का प्रस्ताव है, जो वर्तमान में कार्यरत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) जैसे वैधानिक निकायों का स्थान लेगा।
सरकार इस विधेयक को संसद के वर्तमान शीतकालीन सत्र में पेश करने की तैयारी कर रही है। यह कदम राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में सुझाए गए व्यापक सुधारों को लागू करने की दिशा में अहम माना जा रहा है।
HECI से ‘विकसित भारत शिक्षा अधिनियमन विधेयक’ तक
गौरतलब है कि यह विधेयक पहले उच्च शिक्षा आयोग विधेयक (Higher Education Commission of India – HECI Bill) के नाम से जाना जाता था। इसका मूल उद्देश्य उच्च शिक्षा क्षेत्र में नियमन और निगरानी को सरल, पारदर्शी और प्रभावी बनाना था। NEP 2020 ने स्पष्ट रूप से उच्च शिक्षा के लिए एक सिंगल रेगुलेटरी अथॉरिटी की सिफारिश की थी, ताकि विभिन्न नियामक संस्थाओं के बीच मौजूद दोहराव और टकराव को समाप्त किया जा सके।
नए विधेयक को NEP 2020 की भावना के अनुरूप दोबारा तैयार किया गया है और इसे “विकसित भारत” के व्यापक लक्ष्य से जोड़ा गया है।
क्या होगा नया एकीकृत नियामक?
प्रस्तावित विधेयक के अनुसार, नया एकीकृत नियामक निकाय उच्च शिक्षा संस्थानों में:
- शैक्षणिक नियमन (Academic Regulation)
- मान्यता एवं प्रत्यायन (Accreditation)
- पेशेवर मानकों का निर्धारण (Professional Standards)
जैसे प्रमुख कार्यों की जिम्मेदारी संभालेगा।
यह नियामक विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों और शिक्षक शिक्षा संस्थानों पर समान रूप से लागू होगा। हालांकि, मेडिकल और कानूनी शिक्षा संस्थान इसके दायरे से बाहर रहेंगे, क्योंकि वे पहले से ही अलग-अलग विशेष नियामक संस्थाओं के अंतर्गत आते हैं।
फंडिंग नियामक के पास नहीं, सरकार के पास रहेगी
इस विधेयक की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वित्तीय अधिकार (Funding और Grants) नए नियामक को नहीं दिए जाएंगे। इसके बजाय, वित्तीय नियंत्रण संबंधित प्रशासनिक मंत्रालय के पास ही रहेगा। यह प्रावधान NEP 2020 में सुझाए गए मॉडल का आंशिक रूप से पालन करता है।
नीति में यह प्रस्ताव था कि नियमन, मान्यता, शैक्षणिक मानक और फंडिंग को अलग-अलग ‘वर्टिकल्स’ में बांटा जाए, ताकि शक्ति का केंद्रीकरण न हो और पारदर्शिता बनी रहे। हालांकि, नए विधेयक में नियमन को एकीकृत किया गया है, जबकि फंडिंग को सरकार के अधीन रखा गया है।
एकीकृत नियामक की अवधारणा पुरानी
उच्च शिक्षा के लिए एकल नियामक की अवधारणा कोई नई नहीं है। वर्ष 2018 में पहली बार HECI विधेयक का प्रारूप सामने आया था। उस प्रस्ताव का उद्देश्य UGC अधिनियम को निरस्त कर एक नया केंद्रीय आयोग स्थापित करना था।
हालांकि, उस समय शिक्षाविदों, विश्वविद्यालयों और अन्य हितधारकों की ओर से तीव्र विरोध देखने को मिला था। आलोचकों का कहना था कि इससे:
- अत्यधिक केंद्रीकरण होगा
- शैक्षणिक स्वायत्तता प्रभावित होगी
- राज्यों और विश्वविद्यालयों की भूमिका सीमित हो जाएगी
इन्हीं आशंकाओं के चलते उस समय विधेयक को आगे नहीं बढ़ाया गया।
NEP 2020 के अनुरूप नया प्रयास
वर्तमान विधेयक को सरकार ने एक संशोधित और अधिक व्यापक ढांचे के रूप में पेश किया है। इसमें तकनीकी शिक्षा और शिक्षक शिक्षा को भी एक ही नियामक छतरी के नीचे लाने का प्रावधान किया गया है।
NEP 2020 का मानना है कि अनेक नियामक संस्थाओं की मौजूदगी से:
- नियमों में जटिलता बढ़ती है
- संस्थानों पर प्रशासनिक बोझ पड़ता है
- गुणवत्ता सुधार की प्रक्रिया धीमी होती है
एकीकृत नियामक से शासन व्यवस्था को सरल बनाने, जवाबदेही बढ़ाने और गुणवत्ता पर अधिक ध्यान केंद्रित करने की उम्मीद की जा रही है।
शिक्षा जगत में मिली-जुली प्रतिक्रियाएं
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह विधेयक यदि सही ढंग से लागू हुआ, तो उच्च शिक्षा प्रणाली में संरचनात्मक सुधार ला सकता है। एक साझा नियामक से नियमों की स्पष्टता बढ़ेगी और संस्थानों को अलग-अलग एजेंसियों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।
वहीं, कुछ शिक्षाविदों ने अब भी आशंका जताई है कि नियामक शक्तियों का अत्यधिक केंद्रीकरण विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को प्रभावित कर सकता है। उनका कहना है कि क्रियान्वयन के दौरान राज्यों और शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका को संतुलित रखना बेहद जरूरी होगा।
संसद में होगी अग्निपरीक्षा
अब इस विधेयक की असली परीक्षा संसद में होगी। शीतकालीन सत्र के दौरान इसके पेश होने के बाद विपक्ष और विभिन्न दलों की प्रतिक्रियाएं सामने आएंगी। यह देखना अहम होगा कि सरकार इस विधेयक को लेकर उठने वाली चिंताओं का किस तरह समाधान करती है।
‘विकसित भारत’ के लक्ष्य से जुड़ा शिक्षा सुधार
सरकार का कहना है कि 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए शिक्षा प्रणाली का सशक्त, आधुनिक और वैश्विक मानकों के अनुरूप होना आवश्यक है। उच्च शिक्षा के लिए एकीकृत नियामक इसी दिशा में एक बड़ा सुधारात्मक कदम माना जा रहा है।

