Kuldeep Singh Sengar bail
नई दिल्ली:
देश की राजधानी दिल्ली में बुधवार को जो दृश्य सामने आए, उन्होंने कानून व्यवस्था, मानवाधिकार और न्यायिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। उन्नाव रेप कांड की पीड़िता और उसकी बुजुर्ग मां को उस समय मीडिया से बात करने और शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराने से रोक दिया गया, जब वे दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा पूर्व भाजपा विधायक Kuldeep Singh Sengar bai के खिलाफ आवाज उठाने जा रही थीं।
आरोप है कि CRPF कर्मियों ने न केवल उन्हें जबरन रोका, बल्कि पीड़िता की मां को चलती बस से कूदने पर मजबूर कर दिया। यह घटना उस समय हुई जब मां-बेटी मंडी हाउस में मीडिया को संबोधित करने जा रही थीं।
🚌 चलती बस, धक्के और चीखें: कैसे हुआ पूरा घटनाक्रम
मंगलवार देर रात पीड़िता, उसकी मां और वकील-सामाजिक कार्यकर्ता योगिता भयाना ने इंडिया गेट पर विरोध प्रदर्शन किया था, जिसके बाद उन्हें हिरासत में लिया गया। बुधवार सुबह तीनों ने तय किया था कि वे मंडी हाउस पहुंचकर मीडिया के सामने अपनी बात रखेंगे।
लेकिन जिस CRPF-एस्कॉर्टेड बस में उन्हें ले जाया जा रहा था, वह मंडी हाउस पर नहीं रुकी। CRPF अधिकारियों का कहना था कि मंडी हाउस या इंडिया गेट पर प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई थी और उन्हें या तो जंतर-मंतर ले जाया जाएगा या फिर सीधे घर वापस भेजा जाएगा।
इसी दौरान, बस के गेट पर पीड़िता की मां खड़ी दिखीं। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, CRPF जवान उन्हें कोहनी मारकर नीचे उतरने को कह रहे थे। बस की रफ्तार कम नहीं की गई। लगातार धक्का दिए जाने के बाद, बुजुर्ग महिला को चलती बस से कूदना पड़ा, जबकि पीड़िता बस के अंदर ही रह गई और बस आगे बढ़ गई।
😡 “मेरी बेटी को बंधक बना लिया गया” – पीड़िता की मां
घटना के बाद मीडिया से बात करते हुए पीड़िता की मां ने बेहद भावुक शब्दों में कहा:
“हमें न्याय नहीं मिला। मेरी बेटी को बंधक बना लिया गया है। ऐसा लग रहा है कि वे हमें मार देना चाहते हैं। CRPF वाले मेरी बेटी को लेकर चले गए और मुझे सड़क पर छोड़ दिया। हम विरोध करने जा रहे थे, लेकिन हमें जबरन रोका गया।”
उन्होंने यह भी कहा कि पिछले नौ वर्षों से न्याय की लड़ाई लड़ते-लड़ते उन्होंने अपने पति को खो दिया और अब भी उन्हें लगातार डर और धमकियों का सामना करना पड़ रहा है।
⚖️ दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले (Kuldeep Singh Sengar bail) से क्यों भड़का आक्रोश?
इस पूरे विवाद की जड़ है दिल्ली हाईकोर्ट का वह फैसला, जिसमें अदालत ने कुलदीप सिंह सेंगर की आजीवन कारावास की सजा को निलंबित कर Kuldeep Singh Sengar bai दिया। यह राहत उनकी अपील लंबित रहने तक दी गई है।
अदालत ने तर्क दिया कि 2019 से पहले के POCSO कानून के तहत एक विधायक को “पब्लिक सर्वेंट” या “पोजीशन ऑफ ट्रस्ट” में नहीं माना जा सकता, जिससे न्यूनतम सजा 7 साल बनती है — और सेंगर यह सजा पहले ही काट चुका है।
हालांकि, अदालत ने सेंगर पर कई सख्त शर्तें भी लगाई हैं, जिनमें शामिल हैं:
- ₹15 लाख का निजी मुचलका
- केवल दिल्ली में रहना
- पीड़िता के घर से 5 किमी के भीतर प्रवेश पर रोक
- पीड़िता या परिवार से संपर्क या धमकी नहीं
- पासपोर्ट जमा करना
- हर सप्ताह पुलिस को रिपोर्ट करना
इसके बावजूद, यह राहत पीड़िता और उसके परिवार के लिए गंभीर मानसिक आघात बनकर सामने आई है।
🧑⚖️ “न्यायपालिका हमारे साथ ऐसा कैसे कर सकती है?” – पीड़िता
पीड़िता ने मिडिया से बातचीत में कहा:
“न्यायपालिका हमारे साथ ऐसा कैसे कर सकती है? यह फैसला उत्तर प्रदेश चुनावों से पहले आया है। कुलदीप सिंह के पास पैसा और ताकत है, और हमें ही हर बार भुगतना पड़ता है।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि वे इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगी और आपात सुनवाई की मांग करेंगी।
🚨 CRPF की सफाई और उठते सवाल
CRPF अधिकारियों का कहना है कि वे पीड़िता और उसकी मां को सुरक्षा के तहत उनके दिल्ली स्थित आवास पर वापस ले जा रहे थे, जहां वे वर्षों से CRPF सुरक्षा में रह रही हैं।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि:
- बस में कोई महिला CRPF कर्मी मौजूद क्यों नहीं थी?
- एक बुजुर्ग महिला को चलती बस से उतरने पर क्यों मजबूर किया गया?
- क्या शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार भी अब अनुमति पर निर्भर है?
मानवाधिकार संगठनों और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस घटना को संवेदनहीन और असंवैधानिक बताया है।
🔍 उन्नाव केस: एक नजर में
- जून 2017: यूपी के उन्नाव में नाबालिग से बलात्कार
- आरोपी: तत्कालीन भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर
- 2019: नाबालिग से रेप का दोषी करार, आजीवन कारावास
- पीड़िता के पिता की पुलिस हिरासत में मौत — सेंगर दोषी
- वर्षों तक धमकियां, हादसे और संघर्ष
✊ निष्कर्ष: इंसाफ की लड़ाई अभी खत्म नहीं
Kuldeep Singh Sengar bai से दिल्ली की सड़कों पर जो हुआ, वह सिर्फ एक परिवार के साथ नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था और लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ हुई घटना है। सवाल यह नहीं कि सेंगर को सशर्त राहत क्यों मिली, सवाल यह है कि पीड़िता को अपनी बात कहने से क्यों रोका गया।
यह मामला एक बार फिर साबित करता है कि न्याय केवल अदालतों में नहीं, सड़कों पर भी लड़ा जा रहा है — और यह लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है।

