सोना-चांदी ETF में गिरावट: पिछले कुछ दिनों तक सोना और चांदी निवेशकों के लिए सबसे सुरक्षित और भरोसेमंद विकल्प बने हुए थे। वैश्विक अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिका-यूरोप के बीच बढ़ते टकराव की आशंकाओं के बीच गोल्ड और सिल्वर की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई थीं। इसका सीधा असर गोल्ड और सिल्वर एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ETF) पर भी देखने को मिला और निवेशकों ने बड़ी संख्या में इनमें पैसा लगाया।
हालांकि, 22 जनवरी को हालात अचानक बदल गए। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक बयान ने बाजार की दिशा ही पलट दी। देखते ही देखते सोना-चांदी ETF में तेज गिरावट दर्ज की गई और कई ETF एक ही कारोबारी सत्र में 15 से 21 प्रतिशत तक टूट गए। यह गिरावट निवेशकों के लिए चौंकाने वाली रही, खासकर उनके लिए जिन्होंने हालिया तेजी को देखते हुए ऊंचे स्तरों पर निवेश किया था।
क्यों आई सोना-चांदी ETF में अचानक गिरावट?
असल में सोना-चांदी ETF में गिरावट सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीतिक घटनाक्रम से जुड़ी हुई है। इससे पहले राष्ट्रपति ट्रंप के सख्त बयानों ने वैश्विक बाजारों में डर का माहौल बना दिया था। ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर आक्रामक रुख अपनाया था और कुछ देशों पर भारी टैरिफ लगाने की चेतावनी दी थी। इन बयानों से अमेरिका और यूरोप के बीच तनाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही थी।
ऐसे माहौल में निवेशक आमतौर पर शेयर बाजार से दूरी बनाकर सुरक्षित निवेश की ओर रुख करते हैं। सोना और चांदी को पारंपरिक रूप से सेफ हेवन एसेट माना जाता है। यही वजह रही कि सोने और चांदी की कीमतों में जबरदस्त तेजी आई और सोना-चांदी ETF में रिकॉर्ड निवेश देखने को मिला।
डर के माहौल ने बनाया सोने-चांदी को सुरक्षित ठिकाना
विशेषज्ञों के मुताबिक, जब भी वैश्विक स्तर पर युद्ध, राजनीतिक तनाव या आर्थिक अनिश्चितता बढ़ती है, तब निवेशक जोखिम वाले एसेट्स से पैसा निकालकर सोना-चांदी जैसी संपत्तियों में निवेश बढ़ा देते हैं। हालिया दिनों में भी यही ट्रेंड देखने को मिला।
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप के बयान और टैरिफ की धमकियों ने वैश्विक व्यापार युद्ध की आशंका को हवा दी थी। नतीजतन, शेयर बाजारों में अस्थिरता बढ़ी और निवेशकों ने गोल्ड और सिल्वर ETF को सुरक्षित विकल्प मानते हुए इनमें भारी निवेश किया।
ट्रंप के बयान से बदला पूरा समीकरण
हालांकि, यह तेजी ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाई। दावोस में नाटो के महासचिव मार्क रुट्टे से मुलाकात के बाद राष्ट्रपति ट्रंप के सुर बदले हुए नजर आए। इस मुलाकात के बाद ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर बड़ा बयान दिया।
उन्होंने लिखा,
“इस समझ के आधार पर मैं वह टैरिफ लागू नहीं करूंगा जो एक फरवरी से लागू होने वाले थे।”
हालांकि ट्रंप ने इस समझौते का पूरा ब्योरा सार्वजनिक नहीं किया, लेकिन बाजार ने इसे तनाव कम होने का संकेत माना। इसके साथ ही उन्होंने ग्रीनलैंड को लेकर भी बड़ा बयान देते हुए साफ कर दिया कि अमेरिका वहां कब्जा करने के लिए सैन्य बल का इस्तेमाल नहीं करेगा।
“मुझे ताकत इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं” – ट्रंप
ट्रंप ने अपने बयान में कहा,
“मैं ऐसा नहीं करूंगा. ठीक है? लोग सोच रहे थे कि मैं ताकत का इस्तेमाल करूंगा, लेकिन मुझे ताकत इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं है, मैं करना नहीं चाहता और मैं नहीं करूंगा।”
इस बयान के बाद वैश्विक बाजारों में जोखिम की धारणा (Risk Sentiment) में सुधार देखने को मिला। निवेशकों का डर कम हुआ और उन्होंने एक बार फिर से जोखिम वाले निवेश विकल्पों की ओर रुख करना शुरू कर दिया।
ETF में मुनाफावसूली ने बढ़ाई गिरावट
जैसे ही तनाव कम होने के संकेत मिले, निवेशकों ने सोना-चांदी ETF में मुनाफावसूली (Profit Booking) शुरू कर दी। ऊंचे स्तरों पर बैठे निवेशकों ने तेजी से अपनी होल्डिंग बेचनी शुरू की, जिससे ETF की कीमतों में तेज गिरावट आ गई।
बाजार विश्लेषकों का मानना है कि हालिया गिरावट का बड़ा कारण यह भी है कि सोना और चांदी पहले ही ओवरबॉट जोन में पहुंच चुके थे। ऐसे में किसी भी नकारात्मक या राहत भरी खबर के आते ही करेक्शन आना तय माना जा रहा था।
आगे निवेशकों के लिए क्या संकेत?
विशेषज्ञों के मुताबिक, सोना-चांदी ETF में गिरावट अल्पकालिक हो सकती है। यदि वैश्विक स्तर पर फिर से तनाव बढ़ता है या आर्थिक अनिश्चितता लौटती है, तो सोना और चांदी एक बार फिर निवेशकों का भरोसा जीत सकते हैं।
हालांकि, मौजूदा हालात में निवेशकों को सावधानी बरतने की सलाह दी जा रही है। बिना सोचे-समझे ऊंचे स्तरों पर निवेश करने से बचना चाहिए और लंबी अवधि के नजरिए से ही फैसला लेना बेहतर होगा।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, डोनाल्ड ट्रंप के बदले हुए रुख ने बाजार की तस्वीर ही बदल दी। जहां कुछ दिन पहले तक सोना-चांदी ETF में गिरावट में रिकॉर्ड तेजी थी, वहीं अब उनमें भारी गिरावट देखने को मिल रही है। यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि वैश्विक राजनीति और नेताओं के बयान किस तरह निवेश बाजारों पर गहरा असर डालते हैं।

