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Global Genomics Gap Exposed! WHO रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, 80% रिसर्च सिर्फ अमीर देशों तक सिमित

Global Genomic Research Inequality

Global Genomic Research Inequality

Health & Science Desk | Dec 23:
दुनिया में बीमारियों की जड़ तक पहुंचने वाली Genomic Research आज भी गहरी असमानता का शिकार है। World Health Organization (WHO) की एक नई वैश्विक रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि दुनिया भर में होने वाले 80 फीसदी से अधिक जीनोमिक अध्ययन केवल हाई-इनकम देशों तक सीमित हैं, जबकि लो और मिडिल इनकम देशों (LMICs) में यह आंकड़ा पांच फीसदी से भी कम है।

यह रिपोर्ट ऐसे समय सामने आई है, जब जीनोमिक टेक्नोलॉजी को कैंसर, दुर्लभ बीमारियों और पर्सनलाइज्ड मेडिसिन का भविष्य माना जा रहा है। इसके बावजूद, दुनिया की बड़ी आबादी आज भी इस वैज्ञानिक प्रगति से लगभग बाहर है।


1990 से 2024 तक 6,500 से ज्यादा जीनोमिक स्टडी

WHO के International Clinical Trials Registry Platform (ICTRP) के आंकड़ों के अनुसार, 1990 से 2024 के बीच 6,500 से ज्यादा जीनोमिक क्लिनिकल स्टडीज़ दुनिया भर में रजिस्टर की गईं।

रिपोर्ट के मुताबिक,

हालांकि, यह तेजी भौगोलिक रूप से संतुलित नहीं रही।


चीन टॉप पर, अमेरिका-इटली आगे, भारत टॉप-20 में

पिछले तीन दशकों में सबसे ज्यादा जीनोमिक क्लिनिकल स्टडी दर्ज कराने वाले देशों की सूची में China पहले स्थान पर रहा। इसके बाद United States और Italy का स्थान रहा।

India इस सूची में टॉप-20 देशों में शामिल रहा, जो एक सकारात्मक संकेत जरूर है, लेकिन WHO की रिपोर्ट बताती है कि भारत जैसे देश अधिकतर स्टडीज़ में लीड पार्टनर की बजाय सहयोगी (secondary partner) की भूमिका में ही रहे।

रिपोर्ट के अनुसार:


LMIC देशों की सीमित भागीदारी पर चिंता

WHO रिपोर्ट में कहा गया है कि लो और मिडिल इनकम देशों को कई मल्टी-कंट्री स्टडीज़ में शामिल तो किया गया, लेकिन लीडिंग रोल बहुत कम दिया गया। इससे इन देशों की लोकल हेल्थ जरूरतों और जमीनी बीमारियों पर आधारित रिसर्च सीमित रह गई।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि LMIC देशों को नेतृत्व की भूमिका मिले, तो रिसर्च न सिर्फ ज्यादा समावेशी होगी, बल्कि स्थानीय स्वास्थ्य चुनौतियों के लिए ज्यादा प्रभावी समाधान भी निकल सकते हैं।

Country-wise Genomic Research Comparison (1990–2024)

Source: WHO – International Clinical Trials Registry Platform

RankCountryIncome GroupNumber of Genomic Clinical StudiesGlobal ShareRole in Studies
1ChinaUpper Middle IncomeHighest (Top Rank)Major ShareLead & Partner
2United StatesHigh IncomeVery HighMajor ShareLead
3ItalyHigh IncomeHighSignificantLead
4GermanyHigh IncomeHighSignificantLead
5United KingdomHigh IncomeHighSignificantLead
6JapanHigh IncomeModerate–HighModerateLead
7FranceHigh IncomeModerateModerateLead
8South KoreaHigh IncomeModerateModerateLead
9CanadaHigh IncomeModerateModerateLead
10AustraliaHigh IncomeModerateModerateLead
IndiaLower Middle Income235 StudiesLowMostly Partner
EgyptLower Middle Income38 StudiesVery LowPartner
South AfricaUpper Middle Income17 StudiesVery LowPartner
NigeriaLower Middle Income14 StudiesVery LowPartner

75% से ज्यादा रिसर्च सिर्फ तीन बीमारियों पर केंद्रित

WHO की रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि दुनिया भर में हो रही 75 फीसदी से ज्यादा जीनोमिक रिसर्च सिर्फ कुछ चुनिंदा बीमारियों पर केंद्रित है:

इन क्षेत्रों में जीनोमिक्स का इस्तेमाल शुरुआती दौर से ही होता रहा है, इसलिए निवेश और रिसर्च लगातार बढ़ती गई।


संक्रामक रोगों पर रिसर्च की भारी कमी

सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि संक्रामक बीमारियों (Communicable Diseases) पर जीनोमिक रिसर्च लगभग न के बराबर है।

रिपोर्ट के मुताबिक:

WHO रिपोर्ट में कहा गया है कि:

“Human susceptibility, treatment response और host-pathogen interaction जैसे अहम पहलुओं पर जीनोमिक स्टडीज़ बेहद सीमित हैं, जबकि इनसे इलाज की रणनीति पूरी तरह बदल सकती है।”


उम्र के आधार पर भी रिसर्च में असंतुलन

जीनोमिक स्टडीज़ में डेमोग्राफिक गैप भी साफ नजर आता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों और बुजुर्गों में बीमारियों की प्रकृति अलग होती है, ऐसे में इन वर्गों की उपेक्षा भविष्य की हेल्थ पॉलिसी के लिए खतरा बन सकती है।


WHO की चेतावनी: Genomics ko banana hoga inclusive

WHO की इस रिपोर्ट का सबसे अहम संदेश है कि Genomic Research को ज्यादा inclusive, geographically diverse और context-based बनाना जरूरी है

रिपोर्ट में कहा गया है कि:


भारत के लिए क्या है सबक और मौका?

भारत जैसे देशों के लिए यह रिपोर्ट चेतावनी और अवसर—दोनों है।


निष्कर्ष

WHO की यह रिपोर्ट साफ बताती है कि जीनोमिक साइंस का भविष्य सिर्फ टेक्नोलॉजी से नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण भागीदारी से तय होगा। जब तक गरीब और विकासशील देशों को रिसर्च की मुख्यधारा में नहीं लाया जाएगा, तब तक “Precision Medicine” का सपना अधूरा रहेगा।

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