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गंगोत्री हाईवे चौड़ीकरण: 6,822 पेड़ों पर खतरा! विकास बनाम पर्यावरण की जंग में उलझा भागीरथी इको-सेंसिटिव ज़ोन

Gangotri Highway widening

File Photo

गंगोत्री हाईवे चौड़ीकरण प्रोजेक्ट: उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में गंगोत्री की ओर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग-34 (NH-34) के चौड़ीकरण परियोजना को मिली औपचारिक स्वीकृति ने एक बार फिर पर्यावरण बनाम विकास की पुरानी बहस को तेज़ कर दिया है। यह परियोजना इसलिए अधिक संवेदनशील है क्योंकि यह पूरा क्षेत्र भागीरथी इको-सेंसिटिव ज़ोन (BESZ) के अंतर्गत आता है, जहाँ निर्माण, पहाड़ी कटान और वृक्षों को हटाने पर कड़े प्रतिबंध लागू हैं। हालांकि, सरकार इस परियोजना को सामरिक और आपदा प्रबंधन के दृष्टिकोण से “अत्यंत महत्वपूर्ण” मान रही है, जिसके चलते इसे विभिन्न उच्च-स्तरीय अनुमोदन प्राप्त हुए हैं।


6,822 पेड़ों पर मंडराता संकट: ट्रांसलोकेशन और कटाई की प्रक्रिया

गंगोत्री हाईवे चौड़ीकरण प्रोजेक्ट योजना के तहत, कुल 6,822 पेड़ों को उनके स्थान से हटाने की प्रक्रिया चिह्नित की गई है। इस आंकड़े ने पर्यावरणविदों की चिंता को कई गुना बढ़ा दिया है। वन विभाग ने इन वृक्षों को हटाने के लिए दोहरी रणनीति अपनाई है:

लागत और प्रजातियाँ: पेड़ों के ट्रांसलोकेशन पर ₹324.44 लाख की लागत स्वीकृत की गई है। इन पेड़ों में 0 से 30 व्यास वर्ग तक की कई स्थानीय और पहाड़ी वनस्पतियाँ शामिल हैं, जो इस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं। वन विभाग के अधिकारियों का तर्क है कि यह निर्णय व्यापक वैज्ञानिक मूल्यांकन और सड़क सुरक्षा के अध्ययन के बाद लिया गया है।


वन विभाग के शीर्ष अधिकारियों ने क्यों दी मंजूरी?

पर्यावरण संरक्षण के लिए जिम्मेदार संस्था, वन विभाग के शीर्ष अधिकारियों ने इस प्रस्ताव को “अत्यंत महत्वपूर्ण और समय-सापेक्ष” बताया है।

वरिष्ठ वन अधिकारियों का मानना है कि सड़क का वर्तमान स्वरूप सेना, आपदा राहत टीमों और लाखों तीर्थयात्रियों की आवाजाही के लिए पर्याप्त नहीं है। सड़क को चौड़ा और मज़बूत बनाना अब केवल विकास का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और जीवन रेखा को सुरक्षित बनाने का विषय बन गया है।


गंगोत्री हाईवे चौड़ीकरण प्रोजेक्ट परियोजना का महत्व

यह प्रोजेक्ट सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तरकाशी जिला भारत-चीन सीमा से सटा हुआ है।

सरकार का प्राथमिक तर्क है कि आपात स्थितियों में समय की बचत ही जान बचाती है, और यह प्रोजेक्ट उस क्षमता को सुनिश्चित करेगा।


इको-सेंसिटिव ज़ोन में कैसे मिली अनुमति? BESZ की पृष्ठभूमि

यह प्रश्न उठता है कि जिस क्षेत्र को पर्यावरण संरक्षण के लिए अधिसूचित किया गया था, वहाँ इतने बड़े निर्माण की अनुमति कैसे मिली?

  1. BESZ की घोषणा (2012): केंद्र सरकार ने गोमुख से उत्तरकाशी तक 4179.59 वर्ग किमी क्षेत्र को ‘भागीरथी इको-सेंसिटिव ज़ोन (BESZ)’ घोषित किया था। इसका मुख्य उद्देश्य अनियंत्रित निर्माण, पहाड़ी कटान और नदी तटों पर संरचनाओं को रोककर गंगा-भागीरथी घाटी की पारिस्थितिकी को सुरक्षित करना था।

  2. 2018 का संशोधन: चारधाम ऑल-वेदर रोड प्रोजेक्ट को गति देने के लिए 2018 में BESZ नियमों में संशोधन किया गया। इस संशोधन के तहत, भूमि उपयोग परिवर्तन, ढलानों पर सीमित निर्माण और सड़क चौड़ीकरण जैसे कार्यों को “विशेष परिस्थितियों” में अनुमति दी गई।

  3. रीजनल मास्टर प्लान (2020): 17 जुलाई 2020 को केंद्र ने 135 किमी क्षेत्र का रीजनल मास्टर प्लान मंजूर किया, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी हरी झंडी दे दी। गंगोत्री-उत्तरकाशी मार्ग का यह नया चौड़ीकरण इसी स्वीकृत मास्टर प्लान के अनुरूप है।

यह प्रोजेक्ट राष्ट्रीय राजमार्ग-34 के भैरोघाटी से झाला तक कुल 20.600 किमी क्षेत्र में फैला होगा। इसके लिए 41.9240 हेक्टेयर भूमि को गैर-वानिकी उपयोग के लिए मंजूरी मिली है, जिसके बदले 76.924 हेक्टेयर क्षेत्र में प्रतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) किया जाएगा।


पर्यावरणविदों का विरोध: मामला राज्यसभा तक पहुंचा

इतने बड़े पैमाने पर पेड़ हटाने की योजना से पर्यावरणविदों में गहरी चिंता है।

यह उल्लेखनीय है कि अतीत में भी, 2006 में गंगा-भागीरथी तट पर तीन जलविद्युत परियोजनाओं को बड़े जनविरोध और पर्यावरणीय जोखिमों के कारण रद्द करना पड़ा था, जिसके बाद 2012 में BESZ घोषित हुआ था।


संतुलन की कठिन परीक्षा

गंगोत्री हाईवे चौड़ीकरण प्रोजेक्ट राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक है, इसमें कोई संदेह नहीं है। लेकिन इसके पर्यावरणीय प्रभावों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। यह परियोजना केंद्र और राज्य सरकार के लिए एक कठिन संतुलन की परीक्षा है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) की प्रक्रिया प्रभावी हो और ट्रांसलोकेशन किए गए पेड़ों की उत्तरजीविता दर अधिकतम हो, ताकि सामरिक लाभ के साथ-साथ हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी को भी सुरक्षित रखा जा सके। आने वाले समय में, यह देखा जाना बाकी है कि क्या विरोध और समीक्षा प्रक्रिया के चलते परियोजना के कार्यान्वयन में कोई पर्यावरणीय सुधार किए जाते हैं या नहीं।

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