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देहरादून में जमीन का बड़ा खेल! PWD-राजस्व अधिकारी बनकर पहुंचे आरोपी, मृतक के नाम बना फर्जी मुख्तारनामा

देहरादून जमीन फर्जीवाड़ा

File Photo

देहरादून: राजधानी के राजपुर रोड इलाके में देहरादून जमीन फर्जीवाड़ा ने संपत्ति के दस्तावेजों और उनकी सत्यता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि जमीन अधिग्रहण की जांच के नाम पर कुछ लोग पीडब्ल्यूडी और राजस्व विभाग के अधिकारी-कर्मचारी बनकर एक महिला की संपत्ति पर पहुंचे। इसके बाद जब जमीन के रिकॉर्ड और दस्तावेजों की पड़ताल शुरू हुई तो ऐसा कथित दस्तावेज सामने आया, जिसने पूरे मामले को चौंकाने वाला बना दिया।

देहरादून जमीन फर्जीवाड़ा के शिकायतकर्ता दया सिंह का आरोप है कि उनकी संपत्ति से जुड़े दस्तावेजों में एक ऐसा मुख्तारनामा (Power of Attorney) पंजीकृत मिला, जिसे उनके ससुर स्वर्गीय हरिराज सिंह के नाम से 12 मई 2026 को उप निबंधक चतुर्थ कार्यालय में दर्ज कराया गया था। सबसे गंभीर आरोप यह है कि हरिराज सिंह की मृत्यु 11 मार्च 2013 को हो चुकी थी। यानी शिकायत के अनुसार, जिस व्यक्ति की करीब 13 साल पहले मृत्यु हो चुकी थी, उसके नाम से वर्ष 2026 में कथित तौर पर पावर ऑफ अटॉर्नी तैयार कर पंजीकृत करा दिया गया।

मामले में न्यायालय के आदेश के बाद थाना राजपुर पुलिस ने दीपक अग्रवाल, कपिल नागर, अमन और अधिवक्ता पुनीत दुआ को नामजद करते हुए एक अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। पुलिस का कहना है कि मामले की जांच की जा रही है और जांच में सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

अधिकारी बनकर संपत्ति पर पहुंचे लोग, फिर खुला दस्तावेजों का राज

शिकायत के मुताबिक 27 मई को दोपहर करीब तीन बजे कुछ लोग राजपुर रोड स्थित दया सिंह की संपत्ति पर पहुंचे। आरोप है कि इनमें से कुछ लोगों ने खुद को पीडब्ल्यूडी का कर्मचारी बताया, जबकि अन्य ने राजस्व विभाग से जुड़े अधिकारी होने की बात कही। उन्होंने जमीन अधिग्रहण से संबंधित कार्रवाई का हवाला देते हुए मौके पर मौजूद लोगों से बातचीत की।

इसी दौरान संपत्ति के कुछ हिस्सों के दूसरे लोगों के नाम दर्ज होने की जानकारी सामने आई। इस बात ने शिकायतकर्ता को जमीन के पुराने रिकॉर्ड और दस्तावेजों की जांच कराने के लिए प्रेरित किया। दस्तावेजों की पड़ताल के दौरान कथित तौर पर ऐसा पावर ऑफ अटॉर्नी सामने आया, जिसने शिकायतकर्ता को अपने ससुर की संपत्ति से जुड़े रिकॉर्ड को और गहराई से खंगालने के लिए मजबूर कर दिया।

2013 में मौत, 2026 में पावर ऑफ अटॉर्नी—यही है मामले का सबसे बड़ा सवाल

शिकायतकर्ता के अनुसार 12 मई 2026 को पंजीकृत कथित मुख्तारनामा में उनके ससुर स्वर्गीय हरिराज सिंह को मुख्तारदाता बताया गया है। दया सिंह का दावा है कि हरिराज सिंह की मृत्यु 11 मार्च 2013 को हो चुकी थी।

आरोप यहीं तक सीमित नहीं हैं। महिला का कहना है कि कथित फर्जी दस्तावेज तैयार करने के लिए हरिराज सिंह के नाम से फर्जी आधार कार्ड, फोटो, हस्ताक्षर और अंगूठे के निशान का इस्तेमाल किया गया। दस्तावेज में उनकी उम्र 62 वर्ष दर्ज होने की बात भी शिकायत में कही गई है, जबकि महिला के अनुसार उनके ससुर की मृत्यु के समय उम्र करीब 80 वर्ष थी।

यही विरोधाभास अब पूरे देहरादून जमीन फर्जीवाड़ा मामले की जांच का महत्वपूर्ण बिंदु बन गया है। यदि शिकायत में लगाए गए आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो यह मामला केवल संपत्ति विवाद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पहचान और पंजीकरण से जुड़े गंभीर दस्तावेजी अपराध का रूप ले सकता है। हालांकि इन सभी आरोपों की अंतिम पुष्टि पुलिस जांच और संबंधित दस्तावेजों की फोरेंसिक एवं कानूनी जांच के बाद ही हो सकेगी।

दीपक अग्रवाल के पक्ष में पंजीकरण का आरोप

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि कथित फर्जी मुख्तारनामा दीपक अग्रवाल के पक्ष में पंजीकृत कराया गया। इसमें राजपुर क्षेत्र की खसरा संख्या 717, 718 और 719 से संबंधित जमीन का उल्लेख होने की बात कही गई है।

दया सिंह ने अपने आरोपों के समर्थन में हरिराज सिंह का मृत्यु प्रमाण पत्र और मतदाता पहचान पत्र भी प्रस्तुत किए हैं। शिकायतकर्ता का कहना है कि इन दस्तावेजों से यह स्पष्ट होता है कि जिस व्यक्ति के नाम से वर्ष 2026 में मुख्तारनामा पंजीकृत होने का दावा किया जा रहा है, उसकी मृत्यु उससे कई वर्ष पहले हो चुकी थी।

अब जांच एजेंसियों के सामने यह पता लगाने की चुनौती होगी कि कथित दस्तावेज किस तरह तैयार हुआ, उसमें इस्तेमाल पहचान संबंधी दस्तावेज कहां से आए, पंजीकरण की प्रक्रिया में कौन-कौन लोग शामिल थे और दस्तावेज तैयार करने एवं गवाही देने वालों की भूमिका क्या रही।

वकील और गवाहों की भूमिका पर भी उठे सवाल

शिकायत में दीपक अग्रवाल के साथ कपिल नागर, अमन और अधिवक्ता पुनीत दुआ को भी नामजद किया गया है। इसके अलावा एक अज्ञात व्यक्ति पर हरिराज सिंह बनकर कथित तौर पर फर्जी पहचान इस्तेमाल करने का आरोप लगाया गया है।

शिकायतकर्ता के अनुसार कथित मुख्तारनामे में अधिवक्ता पुनीत दुआ को दस्तावेज का रचयिता बताया गया है, जबकि कपिल नागर और अमन को गवाह के रूप में दर्शाया गया है। पुलिस जांच में अब यह महत्वपूर्ण होगा कि दस्तावेज तैयार करने से लेकर उसके पंजीकरण तक की पूरी प्रक्रिया में किसकी क्या भूमिका थी।

हालांकि, मुकदमा दर्ज होना किसी आरोपी के दोषी होने का प्रमाण नहीं है। सभी आरोपों की पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान ही होगी।

1976-77 में खरीदी गई थी जमीन, परिवार लंबे समय से कर रहा है इस्तेमाल

दया सिंह के अनुसार विवादित जमीन का इतिहास करीब पांच दशक पुराना है। उनका दावा है कि उनके ससुर हरिराज सिंह ने अपने भाई बलवंत सिंह के साथ वर्ष 1976 और 1977 में दो अलग-अलग विक्रय पत्रों के जरिए राजपुर क्षेत्र में खसरा संख्या 717, 718 और 719 की जमीन खरीदी थी।

बाद में इस जमीन के कुछ हिस्से पर मकान बनाए गए। शिकायतकर्ता का कहना है कि वह शादी के बाद करीब 28 वर्षों से इसी संपत्ति में रह रही हैं। उनके देवर और ननद भी लंबे समय से यहां निवास कर रहे हैं।

यानी शिकायतकर्ता के लिए यह मामला सिर्फ जमीन के कागजों का विवाद नहीं है, बल्कि लंबे समय से परिवार के कब्जे और आवास से जुड़ा संपत्ति विवाद भी है। यही वजह है कि कथित दस्तावेज सामने आने के बाद उन्होंने पुलिस से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों और अंततः न्यायालय तक का दरवाजा खटखटाया।

थाने से एसएसपी और फिर कोर्ट तक पहुंचा मामला

महिला के मुताबिक कथित फर्जीवाड़े की जानकारी मिलने के बाद उन्होंने 23 जून को थाना राजपुर में शिकायत देकर मुकदमा दर्ज करने की मांग की थी। जब वहां से अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई तो 25 जून को उन्होंने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, देहरादून को भी प्रार्थना पत्र दिया।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि वहां से भी तत्काल कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने न्यायालय की शरण ली। न्यायालय के आदेश के बाद थाना राजपुर पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया।

थाना राजपुर प्रभारी पीड़ी भट्ट के अनुसार, कोर्ट के आदेश के बाद दीपक अग्रवाल, कपिल नागर, अमन और अधिवक्ता पुनीत दुआ को नामजद करते हुए एक अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। पुलिस मामले की जांच कर रही है।

जांच में कई सवालों के जवाब तलाशेगी पुलिस

अब इस राजपुर रोड जमीन विवाद में पुलिस की जांच कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर केंद्रित हो सकती है। कथित मुख्तारनामे के मूल दस्तावेज, पंजीकरण के समय मौजूद लोगों, पहचान पत्रों, फोटो, हस्ताक्षर और अंगूठे के निशान की सत्यता की जांच अहम होगी। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि संबंधित दस्तावेज पंजीकरण कार्यालय में किस प्रक्रिया के तहत प्रस्तुत किए गए।

जांच के दौरान कथित दस्तावेजों की फोरेंसिक जांच, पुराने राजस्व रिकॉर्ड और जमीन के स्वामित्व से जुड़े दस्तावेजों का मिलान भी महत्वपूर्ण हो सकता है। इसके अलावा शिकायत में नामजद लोगों और कथित गवाहों से पूछताछ के बाद मामले की वास्तविक तस्वीर और स्पष्ट होने की उम्मीद है।

फिलहाल इस मामले ने देहरादून में संपत्ति के दस्तावेजों की सुरक्षा और पंजीकरण प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं। एक मृत व्यक्ति के नाम पर कथित तौर पर वर्षों बाद दस्तावेज तैयार किए जाने के आरोपों ने मामले को और संवेदनशील बना दिया है। अब सबकी नजर पुलिस जांच पर है कि कथित देहरादून जमीन फर्जीवाड़ा के पीछे वास्तव में कौन लोग थे और दस्तावेजों की पूरी श्रृंखला किस तरह तैयार की गई।

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