नई दिल्ली। बजट सत्र 2026-27 संसद में हंगामा शुक्रवार को आठवां दिन है, लेकिन सत्र की कार्यवाही सुचारु रूप से चलने के आसार फिलहाल कम ही नजर आ रहे हैं। गुरुवार को लोकसभा और राज्यसभा—दोनों सदनों में भारी हंगामा देखने को मिला। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक के बीच राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पारित तो हो गया, लेकिन लोकतांत्रिक मर्यादाओं और संसदीय परंपराओं को लेकर गंभीर सवाल भी खड़े हो गए हैं।
राज्यसभा में प्रधानमंत्री के भाषण के दौरान हंगामा
राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा चल रही थी। जैसे ही नरेंद्र मोदी बोलने के लिए खड़े हुए, विपक्षी सांसदों ने आसन के निकट पहुंचकर नारेबाजी शुरू कर दी। कुछ ही क्षणों में सदन का माहौल पूरी तरह से शोरगुल में बदल गया। लगातार नारेबाजी के बाद विपक्षी सांसदों ने राज्यसभा से वॉकआउट कर दिया।
विपक्ष के सदन छोड़ने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में तंज कसते हुए कहा कि जो थक गए हैं, वे बाहर चले गए, लेकिन उन्हें देश की जनता को जवाब देना पड़ेगा कि ऐसी स्थिति क्यों बनी थी जब दुनिया का कोई देश भारत के साथ समझौता करने को तैयार नहीं था। प्रधानमंत्री की इस टिप्पणी को विपक्ष पर सीधा हमला माना जा रहा है।
खरगे पर टिप्पणी को लेकर भी सियासी हलचल
प्रधानमंत्री मोदी ने राज्यसभा के सभापति को संबोधित करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की उम्र को लेकर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि खरगे जी अपनी उम्र को देखते हुए बैठकर भी नारे लगा सकते हैं, जबकि उनके पीछे बैठे युवा सांसद खड़े होकर नारे लगाएं। इस टिप्पणी के बाद विपक्ष ने इसे असंसदीय बताते हुए कड़ी आपत्ति जताई और राजनीतिक बयानबाजी और तेज हो गई।
लोकसभा में भी नहीं थमा हंगामा
उधर, लोकसभा में भी हालात अलग नहीं रहे। विपक्ष के हंगामे के बीच नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलने का अवसर नहीं मिल पाया। इसे लेकर विपक्षी दलों में भारी नाराजगी देखी गई। अंततः प्रधानमंत्री मोदी के भाषण के बिना ही धन्यवाद प्रस्ताव पारित कर दिया गया।
विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार ने जानबूझकर नेता प्रतिपक्ष की आवाज दबाई और संसदीय परंपराओं को दरकिनार किया। कांग्रेस सहित कई दलों ने इसे लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत बताया है।
राहुल गांधी का सरकार पर हमला
राहुल गांधी ने इस मुद्दे को लेकर सोशल मीडिया और मीडिया बाइट्स के जरिए सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार संसद को चर्चा का मंच बनाने के बजाय केवल औपचारिकता निभा रही है। उनका कहना है कि विपक्ष को बोलने से रोकना सीधे तौर पर लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन है। राहुल गांधी लगातार यह सवाल उठा रहे हैं कि जब संसद में बहस ही नहीं होगी, तो सरकार की जवाबदेही कैसे तय की जाएगी।
सियासी गतिरोध के बीच आज का एजेंडा
शुक्रवार को लोकसभा का एजेंडा बेहद व्यस्त है। राजनीतिक शोर-शराबे के बावजूद सदन में कई अहम कार्य सूचीबद्ध हैं। सबसे पहले सुबह 11 बजे से प्रश्नकाल होगा, जिसमें विभिन्न मंत्रालयों से जुड़े सवाल उठाए जाएंगे।
इसके बाद कई केंद्रीय मंत्री सदन के पटल पर महत्वपूर्ण दस्तावेज रखेंगे। स्वास्थ्य, कानून, विदेश, रक्षा, पोत-परिवहन, रसायन और उर्वरक मंत्रालयों से संबंधित रिपोर्ट और कागजात पेश किए जाएंगे। माना जा रहा है कि इन दस्तावेजों पर भी विपक्ष सवाल खड़े कर सकता है।
मंत्रियों के अहम बयान
लोकसभा में आज कुछ अहम बयान भी प्रस्तावित हैं। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय से जुड़ी संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्टों पर मंत्री स्मृति अन्नपूर्णा देवी स्थिति स्पष्ट करेंगी। वहीं, केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान की प्रगति पर सदन को जानकारी देंगी। यह बयान सरकार की सामाजिक और स्वास्थ्य नीतियों को लेकर अहम माने जा रहे हैं।
नियम 377 और निजी मुद्दे
इसके अलावा नियम 377 के अंतर्गत सांसद अपने-अपने क्षेत्रों से जुड़े मुद्दे सदन के समक्ष रखेंगे। यह वह मंच होता है, जहां सांसद स्थानीय और क्षेत्रीय समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर उठाते हैं। विपक्ष इस माध्यम का उपयोग सरकार पर दबाव बनाने के लिए कर सकता है।
आम बजट 2026–27 पर जारी रहेगी बहस
दिन का सबसे अहम एजेंडा आम बजट 2026–27 पर सामान्य चर्चा है। बजट को लेकर सत्ता पक्ष जहां इसे विकासोन्मुख और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया दस्तावेज बता रहा है, वहीं विपक्ष इसे महंगाई, बेरोजगारी और आम आदमी की परेशानियों से भटका हुआ करार दे रहा है। आज की बहस में दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस होने के आसार हैं।
बजट सत्र 2026-27 संसद में हंगामा का आठवां दिन यह साफ संकेत दे रहा है कि सरकार और विपक्ष के बीच टकराव अभी और गहराने वाला है। राज्यसभा से विपक्ष का वॉकआउट हो या लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष को बोलने का मौका न मिलना—ये सभी घटनाएं भारतीय संसदीय लोकतंत्र की मौजूदा चुनौतियों को उजागर करती हैं। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या आने वाले दिनों में सदन में सार्थक चर्चा का माहौल बनेगा या राजनीतिक गतिरोध इसी तरह जारी रहेगा।


