चारधाम यात्रा से जुड़ा बड़ा फैसला। उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था में चारधाम यात्रा की भूमिका रीढ़ की हड्डी जैसी मानी जाती है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु केदारनाथ मंदिर, बद्रीनाथ मंदिर, गंगोत्री मंदिर और यमुनोत्री मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचते हैं, जिससे राज्य को बड़े पैमाने पर राजस्व प्राप्त होता है। अब राज्य सरकार ने इस धार्मिक आस्था को स्वरोजगार और महिला सशक्तिकरण से जोड़ते हुए एक नई पहल की घोषणा की है।
सरकार की योजना के तहत चारधाम के मंदिरों में चढ़ने वाले फूलों से अगरबत्ती और धूपबत्ती तैयार की जाएगी, जबकि पहाड़ों में प्रचुर मात्रा में उगने वाले टिमरू से परफ्यूम (इत्र) बनाया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया में महिला स्वयं सहायता समूहों को प्रमुख भूमिका दी जाएगी।
चारधाम यात्रा और स्वरोजगार का नया मॉडल
उत्तराखंड में चारधाम यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आजीविका का प्रमुख स्रोत भी है। परिवहन, होटल, रेस्टोरेंट, गाइड, पूजा सामग्री और स्थानीय उत्पादों की बिक्री से हजारों परिवार जुड़े हैं।
अब सरकार इस आर्थिक चक्र में एक नया आयाम जोड़ना चाहती है—‘वेस्ट टू वेल्थ’ मॉडल। मंदिरों में प्रतिदिन चढ़ने वाले फूलों को अब बेकार नहीं फेंका जाएगा, बल्कि उन्हें प्रोसेस कर धूपबत्ती और अगरबत्ती बनाई जाएगी। इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार भी सृजित होगा।
इस पहल से चारधाम यात्रा का दायरा केवल तीर्थाटन तक सीमित न रहकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देगा।
टिमरू से परफ्यूम: पहाड़ की खुशबू बाजार तक
नई टिहरी में आयोजित कार्यक्रम में उत्तराखंड राज्य महिला उद्यमिता विकास परिषद की उपाध्यक्ष विनोद उनियाल ने बताया कि पहाड़ी क्षेत्रों में टिमरू की बहुतायत है। अब महिला समूह टिमरू से परफ्यूम तैयार कर रहे हैं।
टिमरू पारंपरिक रूप से औषधीय और धार्मिक उपयोग में आता रहा है। इसकी सुगंधित विशेषता को देखते हुए अब इसे व्यावसायिक उत्पाद के रूप में विकसित किया जा रहा है। यदि यह प्रयोग सफल रहता है तो “हिमालयन परफ्यूम” के रूप में इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाया जा सकता है।
यह कदम न केवल स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग का उदाहरण है, बल्कि महिला उद्यमिता को भी नया प्लेटफॉर्म देगा।
महिलाओं को आर्थिक मजबूती
विनोद उनियाल ने कहा कि केंद्र सरकार का हालिया आम बजट सशक्त, बेहतर और स्वरोजगार उन्मुखी है। इसमें महिलाओं और वंचित वर्गों के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं।
उन्होंने बताया कि उद्योग विभाग के तहत संचालित योजनाओं में महिलाओं की आजीविका संवर्धन को प्राथमिकता दी गई है। अब तक करीब ढाई लाख महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ बनाया जा चुका है।
चारधाम यात्रा से जुड़े फूलों और टिमरू आधारित उत्पादों की यह योजना महिला स्वयं सहायता समूहों की आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएगी। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार के नए अवसर खुलेंगे और पलायन पर भी अंकुश लग सकता है।
टिहरी और ओबीसी मुद्दे पर भी उठी आवाज
कार्यक्रम के दौरान विनोद उनियाल ने टिहरी बांध से प्रभावित क्षेत्रों की समस्याओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने संपूर्ण जिले को ओबीसी श्रेणी में शामिल करने तथा प्रतापनगर और थौलधार को केंद्रीय ओबीसी सूची में जोड़ने की मांग रखी।
उन्होंने बताया कि इस संबंध में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने केंद्रीय ओबीसी आयोग को प्रस्ताव भेजा है।
साथ ही पुरानी टिहरी की प्रतिकृति विकसित करने और बांध प्रभावित मरोड़ा गांव को पर्यटन ग्राम घोषित करने की मांग भी की गई है, ताकि स्थानीय लोगों को अतिरिक्त आय के अवसर मिल सकें।
पर्यावरण और अर्थव्यवस्था का संतुलन
चारधाम यात्रा के दौरान मंदिरों में भारी मात्रा में फूल चढ़ाए जाते हैं। अब तक इनका उचित प्रबंधन एक चुनौती रहा है। नई योजना के तहत इन फूलों को पुनः उपयोग में लाकर पर्यावरणीय दबाव को कम किया जा सकेगा।
धूपबत्ती और अगरबत्ती निर्माण से धार्मिक पर्यटन को भी नया आयाम मिलेगा। श्रद्धालु चारधाम से लौटते समय इन्हें स्मृति-चिह्न के रूप में खरीद सकेंगे। इससे स्थानीय ब्रांडिंग को भी बढ़ावा मिलेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उत्पादों की गुणवत्ता और पैकेजिंग बेहतर रखी गई तो ‘चारधाम अगरबत्ती’ और ‘हिमालयन टिमरू परफ्यूम’ राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय हो सकते हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संबल
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में सीमित संसाधनों के बीच स्थानीय उत्पादों पर आधारित उद्योग ही दीर्घकालिक समाधान माने जाते हैं। चारधाम यात्रा से जुड़े इस नए मॉडल से महिला समूहों को स्थायी आय का स्रोत मिल सकता है।
सरकार की योजना है कि प्रशिक्षण, मार्केटिंग और ब्रांडिंग के माध्यम से इन उत्पादों को संगठित बाजार में उतारा जाए। इससे महिला उद्यमिता को नई पहचान मिलेगी और राज्य की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।
आगे की राह
चारधाम यात्रा से जुड़ा बड़ा फैसला यह पहल धार्मिक आस्था, पर्यावरण संरक्षण और महिला सशक्तिकरण—तीनों को एक साथ जोड़ती है। यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया गया तो यह मॉडल अन्य राज्यों के लिए भी उदाहरण बन सकता है।
नई टिहरी में हुई घोषणा ने स्पष्ट कर दिया है कि उत्तराखंड सरकार अब चारधाम यात्रा को केवल तीर्थाटन नहीं, बल्कि समग्र आर्थिक विकास के रूप में देख रही है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि फूलों से अगरबत्ती और टिमरू से परफ्यूम बनाने की यह पहल कितनी सफल होती है और महिला समूहों की आय में कितना इजाफा कर पाती है।
फिलहाल, राज्य की महिलाओं के लिए यह पहल उम्मीद की नई खुशबू लेकर आई है—एक ऐसी खुशबू, जो पहाड़ों से निकलकर देश-दुनिया तक पहुंच सकती है।

