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देहरादून में महापंचायत बनाम कौतिक महोत्सव: अंकिता न्याय यात्रा मंच का आरोप, परेड ग्राउंड को लेकर सियासी और सामाजिक टकराव

देहरादून परेड ग्राउंड विवाद

देहरादून परेड ग्राउंड विवाद।

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून एक बार फिर जन आंदोलन और प्रशासनिक फैसलों के टकराव का केंद्र बन गई है। 8 फरवरी को देहरादून के परेड ग्राउंड में प्रस्तावित “अंकिता न्याय यात्रा संयुक्त संघर्ष मंच” की महापंचायत से ठीक पहले, उसी स्थल पर 5 से 8 फरवरी तक उत्तरायणी कौतिक महोत्सव के आयोजन ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखी बहस छेड़ दी है। संघर्ष मंच ने इसे महज संयोग मानने से इनकार करते हुए जन आंदोलन को कमजोर करने की “सुनियोजित साजिश” करार दिया है।

पहले से घोषित थी महापंचायत की तारीख

अंकिता न्याय यात्रा संयुक्त संघर्ष मंच के सदस्य मोहित डिमरी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि महापंचायत की तारीख करीब तीन सप्ताह पहले सार्वजनिक कर दी गई थी। इसके बावजूद ठीक उसी अवधि में परेड ग्राउंड में उत्तरायणी कौतिक महोत्सव का आयोजन होना कई सवाल खड़े करता है। उनका कहना है कि यदि प्रशासन और सरकार जन आंदोलन के प्रति संवेदनशील होती, तो पहले से तय कार्यक्रम को ध्यान में रखते हुए reminder ground के आवंटन पर पुनर्विचार किया जाता।

‘संयोग नहीं, साजिश’ का आरोप

मोहित डिमरी ने साफ शब्दों में कहा कि यह महज संयोग नहीं हो सकता। उनके अनुसार, जिस स्थान पर हजारों लोगों की महापंचायत प्रस्तावित है, उसी जगह पर बड़े सांस्कृतिक आयोजन की अनुमति देना आंदोलन की धार को कमजोर करने का प्रयास है। संघर्ष मंच का दावा है कि इससे भीड़ का बंटवारा होगा, संसाधनों पर असर पड़ेगा और प्रशासनिक व्यवस्था को आधार बनाकर महापंचायत पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाया जा सकता है।

महोत्सव के आयोजन पर सवाल

संघर्ष मंच ने यह भी सवाल उठाया कि उत्तरायणी कौतिक महोत्सव किस आधार पर और किन शर्तों पर आयोजित किया जा रहा है। मोहित डिमरी के अनुसार, यह आयोजन एक फाउंडेशन द्वारा कराया जा रहा है, जिसकी संस्थापक उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की धर्मपत्नी गीता धामी हैं। उन्होंने पूछा कि जब परेड ग्राउंड में महापंचायत की तिथि पहले से तय थी, तो उसी स्थल को महोत्सव के लिए क्यों आवंटित किया गया।

फंडिंग और पारदर्शिता का मुद्दा

संघर्ष मंच ने महोत्सव में खर्च हो रही धनराशि के स्रोत को सार्वजनिक करने की भी मांग की है। मंच का कहना है कि यदि आयोजन पूरी तरह सांस्कृतिक है और सार्वजनिक हित में है, तो फंडिंग से जुड़ी जानकारी साझा करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। उनका आरोप है कि पारदर्शिता के अभाव से संदेह और गहराता है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं है।

‘न्याय बनाम वीआईपी संरक्षण’ की लड़ाई

मोहित डिमरी ने इस आंदोलन को केवल एक आयोजन या विरोध तक सीमित न बताते हुए कहा कि यह लड़ाई अब “वीआईपी को बचाने वालों” और “न्याय के लिए संघर्ष कर रहे आम लोगों” के बीच की लड़ाई बन चुकी है। उन्होंने कहा कि अंकिता न्याय यात्रा का उद्देश्य किसी राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को तेज और निष्पक्ष बनाने के लिए दबाव तैयार करना है।

समाज के हर वर्ग का समर्थन

संघर्ष मंच का दावा है कि पिछले कई दिनों से महिलाएं, युवा, पूर्व सैनिक और विभिन्न सामाजिक संगठनों के लोग महापंचायत को सफल बनाने के लिए व्यापक जनसंपर्क कर रहे हैं। गांव-गांव और शहर के अलग-अलग हिस्सों में बैठकें, संवाद और जनसभाएं आयोजित की जा रही हैं। मंच के अनुसार, लोगों में गुस्सा भी है और उम्मीद भी कि इस बार आवाज को अनसुना नहीं किया जाएगा।

महापंचायत को मिल रहा व्यापक समर्थन

संघर्ष मंच के नेताओं का कहना है कि तमाम बाधाओं के बावजूद महापंचायत को लगातार समर्थन मिल रहा है। सोशल मीडिया से लेकर जमीनी स्तर तक लोगों में इसे लेकर चर्चा तेज है। मंच का दावा है कि यह केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि न्याय के लिए लंबे संघर्ष का अहम पड़ाव है।

प्रशासन के सामने चुनौती

एक ओर जहां सरकार और प्रशासन के सामने उत्तरायणी कौतिक महोत्सव जैसे बड़े सांस्कृतिक आयोजन की जिम्मेदारी है, वहीं दूसरी ओर हजारों लोगों की संभावित महापंचायत को लेकर कानून-व्यवस्था और लोकतांत्रिक अधिकारों का सवाल भी खड़ा है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशासन के लिए यह एक संवेदनशील परीक्षा की घड़ी है, जहां संतुलन बनाना बेहद जरूरी होगा।

राजनीतिक और सामाजिक असर

देहरादून परेड ग्राउंड विवाद को लेकर पैदा हुआ यह विवाद आने वाले दिनों में राजनीतिक तापमान और बढ़ा सकता है। विपक्षी दल जहां इसे सरकार की मंशा से जोड़कर देख रहे हैं, वहीं सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि जन आंदोलनों के लिए स्थान और समय को इस तरह सीमित किया जाएगा, तो लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति पर गंभीर सवाल खड़े होंगे।

आगे की राह

अंकिता न्याय यात्रा संयुक्त संघर्ष मंच ने साफ कर दिया है कि किसी भी स्थिति में महापंचायत का आयोजन होगा। मंच का कहना है कि यदि जरूरत पड़ी तो वैकल्पिक रणनीति अपनाई जाएगी, लेकिन न्याय की मांग से पीछे नहीं हटेंगे। वहीं, सरकार और प्रशासन की ओर से इस पूरे मामले पर औपचारिक प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है।

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