उत्तराखंड में SIRPhoto: Bugyal News

देहरादून: उत्तराखंड में SIR (Special Intensive Revision) प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक और सामाजिक माहौल तेजी से गर्माता दिखाई दे रहा है। राजधानी देहरादून समेत राज्य के कई इलाकों में मस्जिदों के बाहर लगाए गए पोस्टर और सूचना पट्ट इन दिनों चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। इन पोस्टरों में लोगों से अपने पुराने दस्तावेज, निवास प्रमाण, पहचान पत्र और मतदाता सूची से जुड़े कागजात सुरक्षित रखने की अपील की गई है, ताकि प्रस्तावित सत्यापन प्रक्रिया के दौरान किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।

राजधानी के पलटन बाजार क्षेत्र सहित कुछ अन्य स्थानों पर लगाए गए इन पोस्टरों ने राजनीतिक हलकों में नई बहस को जन्म दे दिया है। एक ओर समुदाय के लोगों को दस्तावेज व्यवस्थित रखने और सरकारी प्रक्रिया में सहयोग की सलाह दी जा रही है, तो दूसरी ओर इस मुद्दे ने प्रदेश में जनसांख्यिकीय परिवर्तन, बाहरी मतदाताओं और मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों को लेकर चर्चाओं को भी तेज कर दिया है।

क्या है SIR और क्यों अहम मानी जा रही है यह प्रक्रिया?

दरअसल, उत्तराखंड में SIR प्रक्रिया चुनाव आयोग की एक विशेष पुनरीक्षण प्रणाली है, जिसके तहत मतदाता सूची का व्यापक स्तर पर सत्यापन किया जाता है। इस प्रक्रिया में यह जांच होती है कि मतदाता वास्तव में उसी क्षेत्र में निवास कर रहे हैं या नहीं, कहीं एक व्यक्ति का नाम अलग-अलग स्थानों की मतदाता सूची में तो दर्ज नहीं है, और नए पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल किया जा सके।

सूत्रों के मुताबिक राज्य में यह प्रक्रिया अगले कुछ सप्ताहों में शुरू हो सकती है। प्रशासनिक तैयारियां लगभग पूरी मानी जा रही हैं। राज्य में फिलहाल लगभग 11,733 पोलिंग बूथ बताए जा रहे हैं, जबकि करीब 811 नए पोलिंग बूथ बनाए जाने की भी चर्चा है। इसे देखते हुए राजनीतिक दलों ने भी बूथ स्तर पर अपनी रणनीतियां तेज कर दी हैं।

मस्जिदों में पोस्टर लगने से बढ़ी चर्चा

देहरादून के कुछ मुस्लिम बहुल इलाकों में लगे पोस्टरों में लोगों से पुराने दस्तावेज सुरक्षित रखने और पहचान संबंधी रिकॉर्ड व्यवस्थित करने की अपील की गई है। इन पोस्टरों में यह संदेश भी दिया गया है कि यदि चुनाव आयोग या प्रशासन की कोई टीम सत्यापन के लिए पहुंचे तो लोग आवश्यक कागजात के साथ सहयोग करें।

इस मुद्दे पर जब शहर काजी हाशमी से बातचीत की गई तो उन्होंने कहा कि समुदाय के लोगों को केवल सरकारी प्रक्रिया का पालन करने और अपने दस्तावेज व्यवस्थित रखने की सलाह दी जा रही है। उन्होंने कहा कि यदि कोई सत्यापन प्रक्रिया होती है तो लोगों को पूरी तैयारी के साथ प्रशासन का सहयोग करना चाहिए।

शहर काजी ने यह भी स्पष्ट किया कि वह हाल ही में बाहर से लौटे हैं और यह जानकारी जुटा रहे हैं कि पोस्टर किसने और कब लगाए। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि समुदाय स्तर पर लोगों को अपने दस्तावेज सुरक्षित रखने की सलाह पहले भी दी जाती रही है।

वोटर लिस्ट में गड़बड़ी को लेकर पुरानी बहस फिर तेज

राज्य में पिछले कुछ समय से यह चर्चा लगातार चल रही है कि कई जिलों में मतदाता सूची में दर्ज नाम मौके पर नहीं मिल पा रहे हैं। विशेष रूप से सीमावर्ती और शहरी इलाकों में ऐसे मामलों को लेकर राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है।

बीजेपी लगातार यह मुद्दा उठाती रही है कि कुछ लोगों के नाम उत्तराखंड के साथ-साथ दूसरे राज्यों की मतदाता सूचियों में भी दर्ज हो सकते हैं। हालांकि इन दावों की अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन SIR प्रक्रिया के प्रस्तावित शुरू होने के बाद यह बहस एक बार फिर केंद्र में आ गई है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में मतदाता सूची का यह पुनरीक्षण उत्तराखंड की राजनीति में बड़ा मुद्दा बन सकता है, क्योंकि इसका सीधा असर बूथ स्तर की राजनीति और चुनावी गणित पर पड़ सकता है।

कांग्रेस और बीजेपी दोनों ने शुरू की तैयारी

उत्तराखंड में SIR को लेकर कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही सक्रिय दिखाई दे रही हैं। कांग्रेस प्रवक्ता गरिमा दसौनी ने कहा कि पार्टी ने राज्य के सभी जिलों और बूथों पर अपना नेटवर्क मजबूत कर लिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी अल्पसंख्यक समुदाय से दूरी बनाने की राजनीति कर रही है।

गरिमा दसौनी ने कहा कि कांग्रेस संविधान के अनुरूप कार्य करने में विश्वास रखती है और पार्टी की ओर से लोगों को जागरूक भी किया जा रहा है। उन्होंने पश्चिम बंगाल की घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि उत्तराखंड में भी ऐसी परिस्थितियां बनने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

वहीं बीजेपी प्रवक्ता मनवीर सिंह चौहान ने कहा कि पार्टी ने बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं और एजेंटों को प्रशिक्षण देना पूरा कर लिया है। उनका कहना है कि पार्टी का मुख्य उद्देश्य मतदाता सूची को पारदर्शी और त्रुटिरहित बनाना है।

उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति का नाम एक से अधिक राज्यों की मतदाता सूची में दर्ज है तो यह चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता के लिए चुनौती बन सकता है। बीजेपी का जोर ऐसे मामलों की पहचान और निष्पक्ष सत्यापन पर है।

मलिन बस्तियों और बाहरी आबादी पर भी फोकस

उत्तराखंड में SIR को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा देहरादून और उत्तर प्रदेश से सटे जिलों में हो रही है। खासतौर पर मलिन बस्तियों और अवैध कब्जों वाले इलाकों में रहने वाले लोगों के सत्यापन को बड़ी चुनौती माना जा रहा है।

राजधानी देहरादून में पिछले दो दशकों के दौरान मलिन बस्तियों का विस्तार तेजी से हुआ है। रिस्पना और बिंदाल जैसी बरसाती नदियों के किनारे बड़ी संख्या में बस्तियां विकसित हुई हैं। इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के नाम मतदाता सूची में दर्ज होने को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।

प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि प्री-मैपिंग और प्रारंभिक सत्यापन के दौरान कुछ क्षेत्रों में बड़ी संख्या में मतदाता मौके पर नहीं मिले। हालांकि अधिकारियों का यह भी कहना है कि शहरी प्रवास और अस्थायी निवास की वजह से ऐसी स्थिति अन्य राज्यों में भी देखने को मिलती रही है।

प्रशासन ने अफवाहों से बचने की अपील की

उत्तराखंड में SIR को लेकर उपनिर्वाचन अधिकारी अभिनव शाह ने स्पष्ट किया कि अब तक की प्रक्रिया में लगभग 85 प्रतिशत मतदाताओं का सूची से मिलान किया जा चुका है। उन्होंने कहा कि प्रशासन की ओर से किसी भी नागरिक से 40 साल पुराने दस्तावेज मांगने जैसी कोई बात नहीं कही गई है।

उन्होंने कहा कि यदि शहर में कहीं इस तरह के पोस्टर लगाए गए हैं तो प्रशासन उसकी जानकारी जुटा रहा है और आवश्यकता पड़ने पर कार्रवाई भी की जाएगी। साथ ही उन्होंने लोगों से अपील की कि SIR प्रक्रिया को लेकर घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि यह चुनावी व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और व्यवस्थित बनाने की सामान्य प्रक्रिया है।

राजनीतिक बयानबाजी और सामाजिक चर्चाओं के बीच अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि उत्तराखंड में प्रस्तावित SIR प्रक्रिया किस तरह लागू होती है और इसका प्रदेश की राजनीति एवं सामाजिक माहौल पर क्या असर पड़ता है।

By Bhaskar

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