देहरादून में आज उस समय सियासी और सामाजिक माहौल एक साथ गरमा गया, जब पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में हजारों महिलाओं ने सड़कों पर उतरकर “महिला आक्रोश मशाल यात्रा” में हिस्सा लिया। गांधी पार्क से घण्टाघर तक निकली इस यात्रा में माताएं, बहनें और युवतियां बड़ी संख्या में शामिल हुईं, जो महिला आरक्षण से जुड़े मुद्दों पर अपना विरोध दर्ज कराने आई थीं।
यह यात्रा केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि महिला अधिकारों के प्रति बढ़ती जागरूकता और एकजुटता का प्रतीक बनकर उभरी। पूरे मार्ग पर “नारी शक्ति जिंदाबाद” और “हमारा अधिकार हमें दो” जैसे नारों की गूंज सुनाई दी।
“अब नारी चुप नहीं रहेगी”—धामी का सख्त संदेश
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस अवसर पर कहा कि यह मशाल यात्रा उन ताकतों के खिलाफ जनाक्रोश है, जो महिलाओं के अधिकारों में बाधा डालने का प्रयास कर रही हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि अब देश और प्रदेश की महिलाएं चुप बैठने वाली नहीं हैं।
धामी ने कहा, “यह केवल एक रैली नहीं है, बल्कि एक चेतावनी है—उन लोगों के लिए जो नारी शक्ति को कमजोर समझते हैं। अब महिलाएं अपने अधिकारों के लिए स्वयं आगे आकर नेतृत्व कर रही हैं।”

महिला आरक्षण बिल पर सियासी घमासान
मुख्यमंत्री ने महिला आरक्षण बिल को लेकर विपक्षी दलों पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि वर्षों तक इस महत्वपूर्ण विषय को टालने का काम किया गया और जब इसे आगे बढ़ाने का प्रयास हुआ, तब राजनीतिक स्वार्थों के चलते बाधाएं उत्पन्न की गईं।
उन्होंने बिना नाम लिए विपक्ष पर हमला बोलते हुए कहा कि कुछ दलों की मानसिकता महिलाओं के अधिकारों के प्रति सकारात्मक नहीं रही है। यह मशाल यात्रा उसी सोच के खिलाफ जनता की प्रतिक्रिया है।
नई सदी की नारी: जागरूक, मुखर और निर्णायक
मुख्यमंत्री धामी ने अपने संबोधन में यह भी रेखांकित किया कि आज की नारी केवल घर की जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज और राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभा रही है।
उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी की महिलाएं अब अपने अधिकारों और अवसरों को लेकर पूरी तरह जागरूक हैं और लोकतांत्रिक तरीके से अपने विचारों को सामने रख रही हैं।
“आज की नारी निर्णय लेने वाली शक्ति बन चुकी है। वह केवल भागीदारी नहीं चाहती, बल्कि नेतृत्व भी करना चाहती है,” धामी ने कहा।

केंद्र सरकार के प्रयासों को बताया ऐतिहासिक
मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार, विशेषकर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में महिला सशक्तिकरण के लिए किए गए प्रयासों को ऐतिहासिक बताया। उन्होंने कहा कि बीते वर्षों में महिलाओं के लिए कई ऐसी योजनाएं लागू की गई हैं, जिनका असर जमीनी स्तर पर दिखाई दे रहा है।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि महिला आरक्षण का मुद्दा केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन से जुड़ा हुआ है और इसे उसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए।
परिवारवादी राजनीति पर निशाना
कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने उन दलों पर भी निशाना साधा, जो पारंपरिक और परिवारवादी राजनीति करते रहे हैं। उन्होंने कहा कि महिलाओं की बढ़ती भागीदारी से ऐसे दल असहज महसूस कर रहे हैं, क्योंकि इससे उनकी राजनीतिक पकड़ कमजोर हो सकती है।
उन्होंने कहा कि यही कारण है कि ऐसे दल महिलाओं को उनका वास्तविक अधिकार देने से कतराते रहे हैं।
राज्य सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई
मुख्यमंत्री धामी ने भरोसा दिलाया कि उत्तराखंड सरकार महिला सशक्तिकरण के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि राज्य में महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और आर्थिक सशक्तिकरण के लिए लगातार योजनाएं चलाई जा रही हैं।
इस अवसर पर राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट, कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य, विधायक सविता कपूर और आशा नौटियाल सहित कई जनप्रतिनिधि भी मौजूद रहे।

बड़ा राजनीतिक संदेश: नारी शक्ति की एकजुटता
इस विशाल मशाल यात्रा ने स्पष्ट संकेत दिया कि आने वाले समय में महिला मतदाता और सामाजिक शक्ति के रूप में नारी की भूमिका और अधिक प्रभावी होने वाली है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह आयोजन केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी है—कि अब महिलाओं के मुद्दों को नजरअंदाज करना किसी भी दल के लिए आसान नहीं होगा।
विरोध से संकल्प तक का सफर
देहरादून की यह “महिला आक्रोश मशाल यात्रा” केवल एक क्षणिक विरोध नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक बदलाव का संकेत है।
यह स्पष्ट हो चुका है कि महिलाएं अब अपने अधिकारों को लेकर न केवल सजग हैं, बल्कि उन्हें पाने के लिए संगठित होकर संघर्ष करने को भी तैयार हैं। आने वाले समय में यह नारी शक्ति भारतीय लोकतंत्र की दिशा और दशा दोनों को प्रभावित कर सकती है।
