उत्तराखंड उच्च न्यायालयFile Photo: PTI

नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने Uttarakhand Waqf Board में नामित सदस्यों की सदस्यता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए एक अहम आदेश दिया है। कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए वक्फ बोर्ड और उत्तराखंड सरकार को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही अदालत ने इस मामले में 10 मार्च की तिथि अगली सुनवाई के लिए नियत की है।

शनिवार को हुई इस सुनवाई को Uttarakhand Waqf Board के प्रशासनिक ढांचे और उसकी कार्यप्रणाली से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले के रूप में देखा जा रहा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि वक्फ बोर्ड के कुछ नामित सदस्य अपने निर्धारित कार्यकाल से अधिक समय से पद पर बने हुए हैं, जो कि संशोधित नियमावली के स्पष्ट प्रावधानों के खिलाफ है।

अवकाशकालीन न्यायमूर्ति की पीठ में हुई सुनवाई

इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की अवकाशकालीन पीठ के समक्ष हुई। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुना और प्रथम दृष्टया मामले को विचार योग्य मानते हुए नोटिस जारी करने का फैसला किया।

कोर्ट के इस कदम को उत्तराखंड वक्फ बोर्ड के गठन और उसकी वैधानिक प्रक्रिया से जुड़े एक बड़े प्रश्न के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि यह मामला केवल कुछ सदस्यों की नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि बोर्ड की वैधता और पारदर्शिता से भी जुड़ा हुआ है।

क्या है पूरा मामला?

याचिका हल्द्वानी निवासी नसीम अहमद वारसी द्वारा दाखिल की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि वक्फ बोर्ड में कुल 11 सदस्य होते हैं, जिनमें से

  • 5 सदस्य नामित, और
  • 6 सदस्य निर्वाचित होते हैं।

याचिका के अनुसार, निर्वाचित सदस्यों का कार्यकाल तब तक बना रहता है, जब तक नया बोर्ड या नई कार्यकारिणी गठित नहीं हो जाती। लेकिन नामित सदस्यों के मामले में यह व्यवस्था लागू नहीं होती। नियमों के तहत नामित सदस्यों को एक निश्चित अवधि के बाद हटाकर उनके स्थान पर नए सदस्यों की नियुक्ति की जानी चाहिए।

2022 से पद पर बने नामित सदस्य

याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि वक्फ बोर्ड का पिछला चुनाव वर्ष 2022 में हुआ था। इसके बावजूद नामित सदस्य तब से लगातार अपने पद पर बने हुए हैं। याचिका में इसे संशोधित नियमावली का खुला उल्लंघन बताया गया है।

नसीम अहमद वारसी का तर्क है कि यदि नामित सदस्य अनिश्चितकाल तक पद पर बने रहेंगे, तो इससे न केवल बोर्ड की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होंगे, बल्कि यह पूरी व्यवस्था को मनमाने तरीके से संचालित करने का रास्ता भी खोल देगा।

संशोधित नियमावली 2025 की धारा 14 का हवाला

याचिका में विशेष रूप से वक्फ बोर्ड संशोधित नियमावली 2025 का उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता के अनुसार, धारा 14 में स्पष्ट प्रावधान है कि

  • नामित सदस्यों का कार्यकाल स्थायी नहीं होता,
  • जबकि निर्वाचित सदस्य तब तक बने रहेंगे, जब तक नया बोर्ड गठित नहीं हो जाता।

याचिकाकर्ता का कहना है कि नियमावली इतनी स्पष्ट होने के बावजूद नामित सदस्यों का पद पर बने रहना यह दर्शाता है कि या तो नियमों की अनदेखी की जा रही है या फिर जानबूझकर उन्हें लागू नहीं किया जा रहा।

वक्फ बोर्ड का पक्ष: याचिका पोषणीय नहीं

सुनवाई के दौरान वक्फ बोर्ड की ओर से याचिका पर आपत्ति दर्ज की गई। बोर्ड के अधिवक्ता ने अदालत में दलील दी कि यह याचिका पोषणीय नहीं है, इसलिए इसे प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज किया जाना चाहिए।

वक्फ बोर्ड की तरफ से यह भी संकेत दिया गया कि नामित सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया नियमों के तहत की गई है और इसमें किसी तरह की वैधानिक त्रुटि नहीं है। हालांकि, बोर्ड इस संबंध में विस्तृत जवाब अब नोटिस के तहत दाखिल करेगा।

हाईकोर्ट का रुख

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने इस मामले में कोई अंतिम टिप्पणी करने से पहले राज्य सरकार और वक्फ बोर्ड से लिखित जवाब तलब करना उचित समझा। कोर्ट ने साफ किया कि चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल किया जाए, ताकि अगली सुनवाई में सभी तथ्यों और नियमों के आधार पर मामले पर विचार किया जा सके।

10 मार्च को अगली सुनवाई

कोर्ट ने इस याचिका की अगली सुनवाई 10 मार्च को निर्धारित की है। माना जा रहा है कि उस दिन राज्य सरकार और वक्फ बोर्ड की ओर से दाखिल जवाब के बाद यह स्पष्ट हो सकेगा कि नामित सदस्यों की नियुक्ति नियमों के अनुरूप है या नहीं।

क्यों अहम है Uttarakhand Waqf Board का ये मामला?

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल कुछ नामित सदस्यों को हटाने तक सीमित नहीं है। यदि कोर्ट याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला देता है, तो इससे

  • वक्फ बोर्ड की वर्तमान संरचना पर असर पड़ेगा,
  • नामित सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठेंगे,
  • और भविष्य में बोर्ड के गठन को लेकर नई मिसाल कायम हो सकती है।

इसके साथ ही यह मामला यह भी तय कर सकता है कि संशोधित नियमावली 2025 को कितनी सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।

Uttarakhand Waqf Board के नामित सदस्यों की सदस्यता को लेकर उठे सवाल अब न्यायिक जांच के दायरे में आ चुके हैं। उत्तराखंड हाईकोर्ट द्वारा नोटिस जारी किया जाना इस बात का संकेत है कि अदालत इस मामले को गंभीरता से ले रही है। अब सबकी निगाहें 10 मार्च की सुनवाई पर टिकी हैं, जब यह साफ हो सकेगा कि नियमों का पालन हुआ है या नहीं।

By Bhaskar

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